चेक बाउंस मामले में न्यायालय का सख्त रुख
Court takes a tough stance in cheque bounce case.

बिलासपुर। जिला न्यायालय ने चेक बाउंस के एक मामले में आरोपी की चालाकी को पकड़ते हुए उसकी अपील खारिज कर दी है। षष्ठम अपर सत्र न्यायाधीश मनीषा ठाकुर की कोर्ट ने निचली अदालत द्वारा आरोपी सुरेश कुमार केंट को दी गई 3 महीने की कैद और 70,000 रुपये मुआवजे की सजा को बरकरार रखा है। न्यायालय के आदेश के बाद आरोपी की जमानत रद्द कर उसे तत्काल केंद्रीय जेल भेज दिया गया है।
मामला अंबिका मोटर्स (न्यू हालैंड ट्रैक्टर एजेंसी) का है। ग्राम लखराम निवासी सुरेश कुमार केंट (पिता विसाहू राम केंट) ने दिसंबर 2012 में एजेंसी से एक ट्रैक्टर खरीदा था। वाहन की मार्जिन मनी के 40,636 रुपये बकाया थे, जिसके भुगतान के लिए उसने फरवरी 2014 में सेंट्रल बैंक आफ इंडिया का एक चेक जारी किया था।
यह चेक खाते में ‘अपर्याप्त राशि’ होने के कारण बाउंस हो गया। लीगल नोटिस के बाद भी रकम न मिलने पर एजेंसी के प्रोपराइटर प्रत्यूष तिवारी ने कोर्ट की शरण ली थी। नवंबर 2023 में सीजेएम कोर्ट ने आरोपी को दोषी करार दिया था, जिसके खिलाफ आरोपी सत्र न्यायालय में अपील पर आया था।
कोर्ट में आरोपी के अजब-गजब तर्क और खुली पोल
अपील के दौरान आरोपी ने खुद को बेकसूर साबित करने के लिए कई तकनीकी और अजीबोगरीब दलीलें दीं, जिसे अदालत ने साक्ष्यों के तराजू पर तौलते हुए पूरी तरह खारिज कर दिया।
1. खाली चेक देना अपराध से मुक्ति नहीं (सुप्रीम कोर्ट का नजीर)
बचाव: आरोपी का कहना था कि उसने वाहन खरीदते समय केवल सुरक्षा के लिए खाली हस्ताक्षरित चेक दिया था, जिसे परिवादी ने खुद भरकर बाउंस कराया।
कोर्ट का फैसला: कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ‘बीर सिंह बनाम मुकेश कुमार (2019)’ के ऐतिहासिक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि अगर कोई व्यक्ति अपनी मर्जी से दस्तखत किया हुआ खाली चेक किसी देनदारी के बदले देता है, तो सामने वाला उसमें राशि भर सकता है। इससे चेक की वैधता खत्म नहीं होती।
2. ‘बैंक में खाता ही नहीं’ का झूठ पकड़ा गया
बचाव: आरोपी ने दावा किया कि जिस बैंक का चेक है, उसमें उसका कोई खाता ही नहीं है।
कोर्ट का फैसला: जब अदालत ने मूल चेक का मुआयना किया, तो उस पर आरोपी का खाता नंबर पहले से कंप्यूटर प्रिंटेड था। चूंकि चेक पर हस्ताक्षर आरोपी के ही थे, इसलिए कोर्ट ने इस झूठ को खारिज कर दिया।
3. हमनाम की आड़ लेने की कोशिश
बचाव: आरोपी ने एक नया पैंतरा चलते हुए कहा कि ट्रैक्टर उसने नहीं, बल्कि उसके ही गांव के एक दूसरे व्यक्ति ‘सुरेश कुमार पिता पंचराम’ ने खरीदा था। परिवादी ने गलत पिता (विसाहू राम) का नाम लिखकर उसे फंसा दिया।
कोर्ट का फैसला: अदालत ने पाया कि आरोपी पूरे मूल ट्रायल के दौरान कोर्ट से फरार था, जिसके चलते 2020 में उसके खिलाफ स्थायी वारंट जारी हुआ था। नवंबर 2023 में गिरफ्तारी के बाद उसने निचली अदालत में ऐसी कोई आपत्ति नहीं जताई। कोर्ट ने कहा कि अगर कोई दूसरा सुरेश कुमार था, तो आरोपी उसे गवाही के लिए बुला सकता था। बिना किसी सबूत के हमनाम की आड़ लेकर सजा से नहीं बचा जा सकता।
अदालत का अंतिम आदेश
अपर सत्र न्यायालय ने माना कि मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट बिलासपुर द्वारा 22 नवंबर 2023 को सुनाया गया फैसला कानूनी और तथ्यात्मक रूप से बिल्कुल सही है। अदालत ने आरोपी सुरेश कुमार केंट की अपील को सारहीन पाते हुए खारिज कर दिया और जेल वारंट तैयार कर उसे केंद्रीय जेल दाखिल करने का आदेश दिया।



