कलम की मौतें नहीं हुआ करती


कलम की मौतें नहीं हुआ करती वह टूटती है, बिखरती है, सूखती है या हाथों को बदलती है परंतु कलमों की मौतें नहीं हुआ करती। उसी तरह पत्रकार की मौत नहीं हुआ करती वो टूटता है,बिखरता है, संभालता है या बदलता है। बदलता है वो हालतों को , उठाता है वो जनसरोकार के मुद्दों को, वो कोशिश करता है,वो लड़ता है अपने पूरे मद्दे से। दिल, दिमाग,शरीर ,पूरे परिवार और अपने साथियों को समाज की भट्टी में झोंक कर। वो चाहता है कुछ तो बदले, कुछ तो सुधरें। वो कहता है ” कौन कहता है आसमां में सुराख नहीं होते,एक पत्थर तो उछालो तबीयत से यारो।”
जो समाज के लिए , व्यवस्था के लिए हुक्मरानों के जूतों से एक आम से आदमी को बचाने के लिए लगातार लड़ता है और हार नहीं मानता। पर वो अपने साथियों के चंद सिक्कों के लिए नहीं लड़ सकता, जो दूसरों के हकों के लिए जमीन आसमान एक कर दे वो खुद के हक़ के लिए कभी-कभी आवाज भी बुलंद नहीं कर पाता। इसके बाद थक कर रुकता है, सोचता है, फिर अपने को समेटकर निकल जाता है एक नये रास्ते पर और अपने आप से कहता है “कलमों की मौतें नहीं हुआ करती।”

तहलका के साथ इस पारी को यही विराम देते हुए एक आखरी खोजीं पत्रकारिता के साथ सभी पाठकों को जगाने और और अपने अधिकार के लिए लड़ने का प्रण देते हुए।

आखरी सलाम – पंकज विश्वकर्मा

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