नई दिल्ली। इजरायल-अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का असर अब वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी दिखने लगा है। युद्ध जैसे हालात में कच्चे तेल की सप्लाई प्रभावित होने का खतरा बढ़ जाता है। यही वजह है कि कई देश संभावित संकट से निपटने के लिए पहले से ही बड़े पैमाने पर कच्चे तेल का रणनीतिक भंडार (ऑयल रिजर्व) तैयार रखते हैं।
तेल आयात पर निर्भर देशों के लिए यह भंडार बेहद अहम माना जाता है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में किसी कारण से सप्लाई बाधित होती है, तब यही रिजर्व देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में मदद करता है और कीमतों को स्थिर बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, रणनीतिक तेल भंडार के मामले में चीन दुनिया में शीर्ष पर है। चीन के पास करीब 900 मिलियन बैरल कच्चे तेल का भंडार मौजूद है।
इस सूची में जापान दूसरे स्थान पर है। जापान के सरकारी भंडार में करीब 260 मिलियन बैरल कच्चा तेल रखा गया है। वहीं पूरे देश में सरकारी और निजी कंपनियों के भंडार को मिलाकर लगभग 470 मिलियन बैरल तेल का स्टॉक मौजूद है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत के पास करीब 39 मिलियन बैरल कच्चे तेल का रणनीतिक भंडार है। बढ़ती कीमतों के बीच इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) ने कुछ देशों से अपने तेल भंडार जारी करने की अपील की थी, लेकिन भारत ने ऐसा करने से इनकार कर दिया था।
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, भारत ने स्पष्ट किया कि मौजूदा तेल कीमतों का संकट उसकी वजह से नहीं है। इसलिए जिन देशों के कारण यह स्थिति बनी है, उन्हें ही इससे निपटने के लिए कदम उठाने चाहिए।
रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका के स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व में करीब 415.4 मिलियन बैरल कच्चा तेल मौजूद है। इसके अलावा अमेरिका में निजी कंपनियों के पास कमर्शियल स्टॉक के रूप में लगभग 439.3 मिलियन बैरल तेल का भंडार भी है।
जापान के सरकारी तेल भंडार से करीब 146 दिनों तक आयात की जरूरत पूरी की जा सकती है। वहीं निजी कंपनियों के पास भी लगभग 180 मिलियन बैरल ईंधन मौजूद है, जिसमें करीब 90 मिलियन बैरल कच्चा तेल शामिल है।
दूसरी ओर जर्मनी के पास करीब 110 मिलियन बैरल कच्चा तेल और लगभग 67 मिलियन बैरल पेट्रोलियम उत्पाद का स्टॉक है। जरूरत पड़ने पर इन भंडारों को कुछ ही दिनों में बाजार में जारी किया जा सकता है।
