आदिवासी मुख्यमंत्री की मांग, एक उम्मीद : संजय पंत

रिपोर्टर – किशोर कुमार रामटेके स्थान

दंतेवाड़ा। वोटों की गिनती के बाद राज्य में नई सरकार का गठन होगा। राज्य की समस्त जनता को नई सरकार से बहुत उम्मीदें रहेंगी। भारतीय लोकतंत्र में त्यौहार के रूप में मनाये जाने वाले चुनाव में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने के लिए राज्य की समस्त जनता को शुभकामनाएं।

मालिक रूपी जनता ने अपने सेवक रूपी सरकार के चयन के लिए जिस प्रकार उत्साह दिखाया, उसी जनता से यह उम्मीद की जाती है, कि वह गलतियों के लिए अपने सेवक को दंड भी दे। सेवक रूपी सरकार से भी यह उम्मीद की जाती है कि वह भ्रष्टाचार, भाई- भतीजावाद, लालफीता शाही एवं निजी स्वार्थ से ऊपर उठकर अपने मालिक के घर में ही चोरी नहीं करेगी।

बस्तर क्षेत्र के लिए चुने गए इन सेवकों का ईमानदार रहना और भी ज्यादा जरूरी हो जाता है, क्योंकि आरक्षित सीटों से चुने गए इन सेवकों से क्षेत्र की आदिवासी जनता को बहुत उम्मीदें हैं। जल, जंगल और जमीन को बचाने की इस लड़ाई में हजारों किसान आदिवासी भाइयों एवं बहनों का खुले आसमान के नीचे कई सालों से बैठना यह दिखाता है, कि सरकार रूपी सेवक ने अपने मालिक को धोखा दिया। अपने हक एवं अधिकार को मांगने के लिए शांतिपूर्ण एवं संवैधानिक तरीके से प्रदर्शन करने वाले समाज के सभी वर्गों का समर्थन भारतीय किसान यूनियन करता है।

आदिवासी आबादी की बहुलता होने के कारण छत्तीसगढ़ को मध्य प्रदेश से अलग राज्य बनाया गया। राज्य निर्माण के 23 वर्ष हो जाने के बाद भी छत्तीसगढ़ राज्य को आदिवासी मुख्यमंत्री नसीब नहीं हुआ है। राज्य की समस्त आदिवासी जनता यह मांग करती है, कि सरकार किसी भी राजनीतिक पार्टी की बने लेकिन राज्य का अगला मुख्यमंत्री आदिवासी समुदाय से ही होना चाहिए। आदिवासी भाइयों व बहनों द्वारा आदिवासी मुख्यमंत्री की मांग का भारतीय किसान यूनियन पुरजोर समर्थन करता है। बस्तर की समस्त जनता की भावनाओं का सम्मान करते हुए भारतीय किसान यूनियन एक कदम आगे बढ़ते हुए यह मांग भी करता है कि राज्य का अगला मुख्यमंत्री धरती का स्वर्ग कहे जाने वाले बस्तर क्षेत्र से हो।

नई सरकार से यह उम्मीद की जाती है कि वह प्राकृतिक संसाधनों से धनी इस राज्य के खनिज संसाधनों पर अपनी निर्भरता कम करें और स्वयं ही मानव संसाधन का विकास करें। प्रतियोगी परीक्षाओं में भ्रष्टाचार एवं भाई-भतीजा वाद की मार झेल रहे राज्य के युवाओं को नौकरियों की जरूरत है। राज्य के अनियमित, संविदा, ठेका, मानदेय प्राप्त, लघु वेतन कर्मचारियों की मांगों को पूरा करना नई सरकार की पहली जिम्मेदारी होगी। कर्ज माफी के बावजूद राज्य के किसानों की हालत जस की तस बनी हुई है जो सरकार की किसानों के प्रति दोहरे सोच को दिखाता है।

पेसा कानून, भूमि अधिग्रहण अधिनियम, ग्राम सभा, पांचवी अनुसूची, वन संरक्षण अधिनियमों में किसी भी प्रकार के उल्लंघन होने पर भारतीय किसान यूनियन मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री से नहीं बल्कि आरक्षित सीटों से चुने गए विधायकों एवं मंत्रियों से सवाल करेगा। आरक्षित सीटों से चुने गए नए सेवकों से आदिवासी जनता यह उम्मीद करती है कि वह विधानसभा में शपथ लेने के पहले इन अधिनियमों का अच्छे से अध्ययन करेंगे। विधानसभा अध्यक्ष की यह नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि वह आरक्षित सीटों से चुने गए विधायकों से संविधान के अधिनियमों की सालाना परीक्षा ले क्योंकि जब संवैधानिक अधिनियमों की जानकारी ही नहीं होगी तो विधायक अपने ही आदिवासी समाज के अधिकारों की रक्षा कैसे करेंगे।

भारतीय लोकतंत्र सभी समाजों का है और राज्य एवं देश का नेतृत्व करने के लिए सबसे पहले और सबसे ज्यादा हक आदिवासी समाज का बनता है क्योंकि वह इस धरती के सबसे पहले निवासी हैं। सभी राजनीतिक पार्टियों से यह अपील की जाती है कि सरकार किसी भी पार्टी की बने लेकिन राज्य का अगला मुख्यमंत्री आदिवासी समाज एवं बस्तर क्षेत्र से ही होना चाहिए क्योंकि आदिवासी मुख्यमंत्री राज्य के आदिवासियों का एक सपना है।

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