अमेरिका और ईरान के बीच सुलह में पाकिस्तान की मध्यस्थता का राज
The secret of Pakistan's mediation in the reconciliation between America and Iran

नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के बीच हुए दो सप्ताह के ऐतिहासिक युद्धविराम ने पूरी दुनिया को चौंका दिया है। इस कूटनीतिक सफलता के पीछे पाकिस्तान एक मुख्य सेतु बनकर उभरा है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने सार्वजनिक रूप से प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर को ‘प्रिय भाई’ कहकर उनके प्रयासों की सराहना की, जबकि राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने भी इस मध्यस्थता को अप्रत्यक्ष रूप से स्वीकार किया है।
मध्यस्थता की अनकही कहानी
रिपोर्ट्स के अनुसार, यह सीजफायर रातों-रात नहीं हुआ। जनरल असीम मुनीर ने अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और ईरानी नेतृत्व के बीच बैकचैनल डिप्लोमेसी की कमान संभाली। पाकिस्तान ने अमेरिका के 15-सूत्रीय शांति प्रस्ताव को न केवल ईरान तक पहुंचाया, बल्कि तेहरान की चिंताओं को वॉशिंगटन के साथ साझा कर संवाद की निरंतरता बनाए रखी। 29 मार्च को तुर्की, सऊदी अरब और मिस्र के साथ पाकिस्तान की उच्च स्तरीय बैठक ने इस शांति प्रक्रिया को क्षेत्रीय समर्थन भी प्रदान किया।
पाकिस्तान पर ही भरोसा क्यों?
ईरान के लिए पाकिस्तान एक विश्वसनीय पड़ोसी है, क्योंकि इस्लामाबाद के इजरायल के साथ राजनयिक संबंध नहीं हैं। दूसरी ओर, अमेरिका के साथ पाकिस्तान के सुधरते रिश्तों और जनरल मुनीर के व्यक्तिगत संपर्कों ने दोनों शक्तियों को एक मेज पर लाने का काम किया। अरब देशों की तुलना में ईरान, पाकिस्तान को एक ‘न्यूट्रल’ खिलाड़ी के रूप में देखता है।
बढ़ती ईंधन की कीमतों से पाकिस्तान में हाहाकार
पाकिस्तान का यह प्रयास निस्वार्थ नहीं था। होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव के कारण बढ़ती ईंधन की कीमतों ने पाकिस्तान की पहले से ही जर्जर अर्थव्यवस्था पर गहरा दबाव डाला था। इसके अलावा, खाड़ी देशों में काम करने वाले लाखों पाकिस्तानी नागरिकों की सुरक्षा और ऊर्जा सुरक्षा के लिए क्षेत्र में शांति अनिवार्य थी।



