मध्यप्रदेश

NEET विवाद में बुझ गया डॉक्टर बनने का सपना: मां का सवाल— मेरी बेटी लौटा पाओगे क्या?”

The NEET controversy extinguished her dream of becoming a doctor: A mother asks, "Will you be able to return my daughter?"

मऊगंज | रीवा मप्र रिपोर्टर सुभाष मिश्रा 

 राहुल गांधी ने परिजनों से की बात, न्याय और सहायता का दिया भरोसा; आकांक्षा की मौत पर सियासत तेज

मऊगंज/रीवा। डॉक्टर बनने का सपना लेकर घर से निकली 18 वर्षीय आकांक्षा चतुर्वेदी अब इस दुनिया में नहीं है। लेकिन उसके जाने के बाद उसके घर में पसरा सन्नाटा, मां की चीखें और पिता की टूटी उम्मीदें देश की शिक्षा व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े कर रही हैं। मऊगंज जिले के मगनिया गांव की रहने वाली आकांक्षा ने नागपुर में कथित NEET परीक्षा विवाद और उससे उपजे तनाव के बीच आत्महत्या कर ली थी। बेटी को खो चुकी मां नीलम चतुर्वेदी की आंखों में आज भी आंसू हैं। उनका एक ही सवाल है— “पेपर तो दोबारा करा लोगे, लेकिन मेरी बेटी को लौटा पाओगे क्या?” यह सवाल केवल एक मां का नहीं, बल्कि उन लाखों परिवारों का है जो अपने बच्चों के सपनों के लिए सब कुछ दांव पर लगा देते हैं।

कर्ज लेकर बेटी को डॉक्टर बनाना चाहता था पिता

आकांक्षा के पिता कृष्ण कुमार चतुर्वेदी किसान हैं। परिजनों के अनुसार बेटी को डॉक्टर बनाने के लिए उन्होंने किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) के माध्यम से लाखों रुपये का कर्ज लिया था। दो बार हार्ट अटैक और लकवे जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं के बावजूद उन्होंने बेटी की पढ़ाई में कोई कमी नहीं आने दी। परिवार को विश्वास था कि एक दिन आकांक्षा डॉक्टर बनकर घर की आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियां बदल देगी।

लेकिन बेटी की मौत की खबर ने पूरे परिवार को तोड़ दिया। पिता की तबीयत बिगड़ गई और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। वे अपनी बेटी को अंतिम विदाई तक नहीं दे सके।

650 से अधिक अंक आने की थी उम्मीद

परिजनों के मुताबिक आकांक्षा पढ़ाई में बेहद मेधावी थी। उसे NEET परीक्षा में 650 से अधिक अंक मिलने की उम्मीद थी। परीक्षा देकर लौटने के बाद वह काफी खुश थी और अपने सपने को साकार होते देख रही थी। लेकिन परीक्षा को लेकर सामने आए विवादों और अनिश्चितताओं ने उसे मानसिक रूप से परेशान कर दिया।

छोटे भाई राज चतुर्वेदी ने बताया कि घटना से तीन दिन पहले उसने खाना-पीना लगभग छोड़ दिया था। वह लगातार चुप रहने लगी थी और तनाव में दिखाई दे रही थी।

राजनीति भी गरमाई

आकांक्षा की मौत के बाद मामला राजनीतिक रूप ले चुका है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सोशल मीडिया के माध्यम से केंद्र सरकार और शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि आकांक्षा डॉक्टर बनकर समाज की सेवा करना चाहती थी, लेकिन एक भ्रष्ट और टूटी हुई व्यवस्था ने उसका सपना छीन लिया।

राहुल गांधी ने यह भी कहा कि एक किसान पिता ने बेटी की पढ़ाई के लिए कर्ज लिया, संघर्ष किया, लेकिन व्यवस्था की खामियों ने एक होनहार छात्रा की जान ले ली।

वहीं भाजपा की ओर से कांग्रेस के आरोपों का जवाब देते हुए कहा गया कि विपक्ष इस मामले में भ्रम फैलाकर राजनीतिक लाभ लेने का प्रयास कर रहा है और तथ्यों के बजाय भावनात्मक राजनीति कर रहा है।

राहुल गांधी ने की परिजनों से बातचीत

इसी बीच एनएसयूआई की पहल पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने आकांक्षा चतुर्वेदी के परिजनों से दूरभाष पर बातचीत की। पूर्व एनएसयूआई प्रदेश अध्यक्ष मंजुल त्रिपाठी मऊगंज जिले के नई गाड़ी गांव पहुंचे और परिजनों से मुलाकात की। उनके प्रयासों से आकांक्षा के माता-पिता एवं बड़े पिताजी की राहुल गांधी से फोन पर बात कराई गई।

बातचीत के दौरान राहुल गांधी ने परिजनों के प्रति संवेदना व्यक्त करते हुए कहा कि मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए तथा दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए। उन्होंने परिवार को भरोसा दिलाया कि कांग्रेस पार्टी न्याय की लड़ाई में उनके साथ खड़ी है।

तीन लाख रुपये की आर्थिक सहायता

एनएसयूआई और कांग्रेस की ओर से परिवार को पूर्व में दी गई 2.50 लाख रुपये की सहायता के अतिरिक्त 50 हजार रुपये की शेष राशि भी सौंपी गई। इस प्रकार परिवार को कुल 3 लाख रुपये की आर्थिक सहायता प्रदान की जा चुकी है।

मंजुल त्रिपाठी ने कहा कि यह केवल आर्थिक सहयोग का विषय नहीं, बल्कि एक बेटी को न्याय दिलाने का संकल्प है। उन्होंने कहा कि जब तक आकांक्षा और उसके परिवार को न्याय नहीं मिल जाता, तब तक कांग्रेस पार्टी और एनएसयूआई उनके साथ मजबूती से खड़े रहेंगे।

दादी की आंखों में दर्द, बड़े पिता की भर्राई आवाज

90 वर्षीय दादी यशोदा चतुर्वेदी की आंखों में आज भी पोती की यादें ताजा हैं। वे कहती हैं, “जिस उम्र में मुझे जाना चाहिए था, उस उम्र में पोती को जाते देख लिया। इससे बड़ा दुख क्या होगा।”

वहीं बड़े पिता हनुमान प्रसाद चतुर्वेदी भावुक होकर कहते हैं, “जिस उम्र में उसकी डोली उठनी थी, उसी उम्र में उसकी अर्थी को कंधा देना पड़ा।”

गांव में पसरा सन्नाटा

आकांक्षा की मौत ने पूरे क्षेत्र को झकझोर दिया है। परिजनों का कहना है कि अब कई अभिभावक अपनी बेटियों को उच्च शिक्षा के लिए बाहर भेजने से डर रहे हैं। यह घटना केवल एक परिवार का दुख नहीं, बल्कि उन सपनों की त्रासदी बन गई है जिन्हें बेहतर भविष्य की उम्मीद में लाखों छात्र-छात्राएं हर साल प्रतियोगी परीक्षाओं के माध्यम से साकार करने का प्रयास करते हैं। आज भी मगनिया गांव में जब आकांक्षा का नाम लिया जाता है तो लोगों की आंखें नम हो जाती हैं। एक मां की पुकार अब भी गूंज रही है— “पेपर दोबारा करा लोगे, लेकिन मेरी बेटी को लौटा पाओगे क्या?”

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