रीवा मप्र रिपोर्टर सुभाष मिश्रा
रीवा। देशभर में विजयादशमी का पर्व धूमधाम से मनाया गया, लेकिन विंध्य की नगरी रीवा में दशहरे की छटा हमेशा की तरह निराली रही। यहाँ राजघराने द्वारा निभाई जाने वाली 400 साल पुरानी शाही परंपरा इस बार भी लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी।
गुरुवार की शाम रीवा किले में पहले गद्दी पूजन का आयोजन हुआ। महाराजा पुष्पराज सिंह व युवराज दिव्यराज सिंह ने राजाधिराज भगवान राम की पूजा-अर्चना की। परंपरा के अनुरूप राजपुरोहितों द्वारा वैदिक मंत्रोच्चार के बीच सिंहासन पर भगवान राम, सीता और लक्ष्मण की विशेष पूजा की गई।
इसके बाद महाराजा ने बाहर प्रतीक्षारत जनता को दर्शन दिए और मंच से शुभ संकेत स्वरूप नीलकंठ पक्षी को आकाश की ओर उड़ाया। साथ ही पान खाने की परंपरा निभाई गई, जिसे दशहरे के दिन अत्यंत शुभ माना जाता है।
राजसी चल समारोह
परंपरा के मुताबिक रीवा किले से भव्य चल समारोह निकाला गया। रथ पर सवार भगवान राम नगर भ्रमण पर निकले तो रियासत के महाराजा उनके सेवक बनकर साथ-साथ चलते रहे। इस दौरान मां दुर्गा की झांकियों ने शोभा बढ़ाई। सैकड़ों वर्षों से चली आ रही यह परंपरा आज भी रीवा की आन-बान और ऐतिहासिक धरोहर मानी जाती है।
इतिहासकारों के अनुसार बघेल राजवंश के महाराज विक्रमादित्य सिंह जूदेव ने 16वीं शताब्दी में रीवा को राजधानी बनाया था। तब से लेकर आज तक राजसिंहासन पर सिर्फ भगवान राम ही विराजमान होते आए हैं। राजवंश के महाराज स्वयं को भगवान का सेवक मानकर जनता की सेवा करते हैं।
रावण दहन से गूंजा दशहरा मैदान
चल समारोह शहर के मार्गों से होता हुआ एनसीसी ग्राउंड पहुँचा। यहाँ सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के बाद परंपरागत रावण दहन हुआ। आतिशबाजी के बीच रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतले धू-धू कर जल उठे और पूरे मैदान में “जय श्रीराम” के जयघोष गूंजने लगे।
मान्यता है कि दशहरे के दिन महाराजा के दर्शन होना, नीलकंठ पक्षी का आकाश की ओर उड़ना और पान का सेवन करना अत्यंत शुभ फलदायी होता है। यही वजह है कि हर वर्ष हजारों की संख्या में लोग रीवा किले और दशहरा मैदान में इस ऐतिहासिक पल के साक्षी बनने पहुँचते हैं।
