कलम से

राजधर्म का यह भी आशय है कि अगर आप व्यक्तिगत रूप से किसी के प्रति विद्वेष रखते हैं, या वह आपके समर्थक-वर्ग का विरोधी है, या आपको लगता है कि उसने अन्याय किया है, तब भी शासक होने के नाते आप अपनी धारणाओं के विपरीत जाकर उसको पूरी नागरिक सुरक्षा और न्याय मुहैया कराते हैं, क्योंकि जब आप पद पर होते हैं तो एक व्यक्ति नहीं संस्था होते हैं और संस्था का स्वयं का कोई पूर्वग्रह नहीं हो सकता है।
महत्वपूर्ण विषय हो जाता है जब आप प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, जिलाधीश या किसी भी संस्था के प्रमुख हो जाते हैं। क्योंकि यदि आप प्रजातंत्र में पद पर सुशोभित है तो सभी नागरिक या सदस्य समान होते हैं,और पूर्वानुमान या पूर्वाग्रह से स्वयं को अलंकृत कर तटस्थ निर्णय से भटक जाते हैं और यही भटकावों से गुजर कर आप ना सिर्फ विश्वास खोते हैं अपितु जनमत भी,साथ ही खोते हैं आप अपने विश्वस्त सहयोगी, सूत्रों के सारथी। जिन सूत्रों के सहारे आप रथ में आरूण हो, अपने अहंकार के चाबुक को चला कर, अपने अधीनस्थ रूपी घोड़े दौड़ा सकें थे।
खैंर निर्णय आप का था, मतिभ्रम आप को है,तो पश्चाताप भी आप को होना चहिए।


