बलरामपुर डीईओ कार्यालय पर उठे सवाल: शिकायत के बाद भी कार्रवाई नहीं, अभिभावक ने पूछा– क्या राजनीतिक दबाव या रिश्वत का खेल

Questions raised regarding the Balrampur DEO office: No action taken despite complaints; a parent asks—is it political pressure or a case of bribery?

बलरामपुर/(शोएब सिद्दिकी) जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय बलरामपुर-रामानुजगंज की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। एक अभिभावक ने आरोप लगाया है कि शिक्षा का अधिकार (आरटीई) अधिनियम, 2009 के तहत अध्ययनरत उसकी पुत्री से निजी विद्यालय द्वारा वर्षों तक कथित रूप से अवैध शुल्क लिया गया। इस संबंध में लिखित शिकायत, दस्तावेज तथा बैंक भुगतान के रिकॉर्ड प्रस्तुत किए जाने के बावजूद अब तक संबंधित विद्यालय प्रबंधन के विरुद्ध कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई।

अभिभावक द्वारा उपलब्ध कराए गए आवेदन के अनुसार, 23 मार्च 2026 को जिला शिक्षा अधिकारी को शिकायत सौंपकर आरोप लगाया गया था कि आरटीई के तहत अध्ययनरत छात्रा से अलग-अलग वर्षों में शुल्क लिया गया तथा शुल्क नहीं देने पर छात्रा के साथ कथित रूप से भेदभावपूर्ण व्यवहार किया गया। शिकायत में यह भी उल्लेख है कि पाठ्यपुस्तकें उपलब्ध नहीं कराई गईं, छात्रा को विद्यालय के आधिकारिक व्हाट्सएप समूह में शामिल नहीं किया गया और अन्य विद्यार्थियों की तुलना में उपेक्षापूर्ण व्यवहार किया गया।

शिकायत के साथ बैंक स्टेटमेंट की प्रतियां भी संलग्न की गई हैं, जिनमें विभिन्न तिथियों पर विद्यालय से जुड़े खाते में ऑनलाइन भुगतान दर्ज होने का दावा किया गया है। अभिभावक का कहना है कि इतने दस्तावेज उपलब्ध कराने के बावजूद शिक्षा विभाग की ओर से अब तक दोषियों पर कार्रवाई नहीं होना कई सवाल खड़े करता है।

अभिभावक ने मांग की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर यदि आरटीई अधिनियम का उल्लंघन पाया जाता है तो संबंधित विद्यालय प्रबंधन के विरुद्ध अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार कठोर कार्रवाई की जाए तथा छात्रा को बिना किसी भेदभाव के शिक्षा का अधिकार सुनिश्चित कराया जाए।

 

इस प्रकरण को लेकर स्थानीय स्तर पर भी चर्चा है। लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय पर किसी प्रकार का राजनीतिक दबाव है या फिर कार्रवाई में देरी के पीछे अन्य कारण हैं? हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और न ही इस संबंध में विभाग का आधिकारिक पक्ष सामने आया है।

 

अब निगाहें जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग पर टिकी हैं कि प्रस्तुत शिकायत, दस्तावेजों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर निष्पक्ष जांच कर वास्तविक स्थिति स्पष्ट की जाएगी या नहीं। यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई और यदि आरोप गलत पाए जाते हैं तो उसका भी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया जाना आवश्यक होगा, ताकि शिक्षा व्यवस्था में जनता का विश्वास बना रहे।

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