जगदलपुर: चार दशक के माओवादी प्रभाव के बाद बस्तर में बदलाव, 108 माओवादी समर्पित, विकास के रास्ते खुले
Jagdalpur: After four decades of Maoist influence, Bastar has changed; 108 Maoists surrender, opening the way for development.

जगदलपुर। चार साल पहले जब केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने माओवादी हिंसा के समूल अंत की समयसीमा तय की थी, तो इस घोषणा को लेकर शंकाएं थीं। जंगलों में जड़ें जमा चुके माओवादी नेटवर्क को समाप्त करना आसान नहीं माना जाता था। खुद संगठन ने इसे चुनौती के रूप में लिया था।
हालांकि, बीते कुछ वर्षों में हालात तेजी से बदले हैं। कभी कई जिलों में फैला माओवादी प्रभाव अब बस्तर के सीमित जंगलों तक सिमट गया है। सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई, बड़े माओवादी नेताओं के मारे जाने और समर्पण के बाद संगठन की स्थिति काफी कमजोर हो चुकी है।
समर्पण कर चुके माओवादी बताते हैं पुरानी कहानी
समर्पण कर चुकी पदमी बताती हैं कि 2022 में अबूझमाड़ के भीतर माओवादियों ने बड़े आयोजन किए थे, जिसमें शीर्ष नेता बसव राजू, भूपति, देवजी और रुपेश शामिल थे। दर्जनों गांवों से चार-पाँच हजार लोग इन कार्यक्रमों में भाग लेते थे। नई भर्ती युवाओं को प्रशिक्षण देकर जंगलों में भेजा जाता था।
108 माओवादियों का सामूहिक समर्पण
हाल ही में जगदलपुर में 108 माओवादी सामूहिक रूप से समर्पित हुए। अब क्षेत्र में सक्रिय शीर्ष माओवादियों की संख्या घटकर केवल 10 रह गई है। इनमें सुकमा-दंतेवाड़ा सीमा क्षेत्र के डीकेएसजेडसी सदस्य पापाराव, सोढ़ी केसा, डिविजनल कमेटी सदस्य हेमला विज्जा, चंदर कतलाम और प्रकाश माड़वी शामिल हैं। इनके साथ 20–25 अन्य सदस्य सक्रिय हो सकते हैं।
सुरक्षा बलों की कार्रवाई से संगठन कमजोर
पिछले एक वर्ष में बसव राजू, विवेक मांझी, सहदेव सोरेन, हिड़मा, जोगा राव सहित कई शीर्ष माओवादी मारे गए। इसके अलावा भूपति, देवजी, मल्लाजी रेड्डी, रुपेश, दामोदर और सुजाता जैसे नेताओं के समर्पण से संगठन की रीढ़ ही टूट गई।
अब विकास की राह खुली
बस्तर के अंदरूनी इलाकों में चार दशकों तक माओवादी प्रभाव के कारण विकास बाधित रहा। अब हालात बदलने लगे हैं। भैरमगढ़ के इतामपार घाट पर ग्रामीण और पूर्व माओवादी मिलकर नई कहानी लिख रहे हैं।
तीन साल पहले माओवादियों ने नाव छीनकर इलाके को विकास से रोका था। अब लगभग 300 ग्रामीण प्रतिदिन रेत के बोरों से अस्थायी पुल बना रहे हैं। पूर्व माओवादी बुधरुराम और जग्गाराम भी इसमें सक्रिय हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि पुल बनने से कई गांवों तक पहुंच आसान हो जाएगी। प्रशासन इन गांवों में सड़क, प्रधानमंत्री आवास और स्कूल शुरू करने की तैयारी कर रहा है। पुल निर्माण से विकास की राह अब मजबूती से खुल रही है।


