छत्तीसगढ़

धर्म स्वातंत्र्य कानून मामले में हाईकोर्ट का बड़ा आदेश

High Court's major order in the religious freedom law case.

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने प्रदेश में लागू ‘छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम 2026’ के क्रियान्वयन और प्रवर्तन पर रोक लगाने की मांग वाली रिट याचिका को खारिज कर दिया है। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने स्वयं याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी, जिसके बाद मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने इसे भविष्य में इसी मुद्दे पर दोबारा याचिका दायर करने की स्वतंत्रता दिए बिना वापस मानते हुए खारिज कर दिया।

56 वर्षीय मोसेस लोगन ने दायर की थी याचिका

याचिका भिलाई (दुर्ग) के हाउसिंग बोर्ड निवासी 56 वर्षीय मोसेस लोगन ने दायर की थी। याचिकाकर्ता ने अदालत से नए कानून के संचालन, लागू होने और प्रवर्तन पर एकतरफा अंतरिम रोक लगाने की मांग की थी। मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता अमन प्रसाद वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से उपस्थित हुए, जबकि राज्य शासन की ओर से महाधिवक्ता विवेक शर्मा और शासकीय अधिवक्ता शालीन सिंह बघेल ने पक्ष रखा।

राज्य सरकार ने रखा कानूनी पक्ष

महाधिवक्ता विवेक शर्मा ने अदालत को बताया कि इसी अधिनियम को चुनौती देने वाली दो याचिकाएं पहले भी हाई कोर्ट में दायर हो चुकी हैं, जिन्हें 24 अप्रैल 2026 और 8 मई 2026 को डिवीजन बेंच ने समयपूर्व मानते हुए खारिज कर दिया था। उन्होंने दलील दी कि वर्तमान याचिका भी उसी प्रकार की है और इसे भी समयपूर्व मानकर खारिज किया जाना चाहिए।

याचिकाकर्ता ने वापस लिए कदम

राज्य सरकार की दलीलों और पूर्व के आदेशों का हवाला दिए जाने के बाद याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने रिट याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी। इस पर राज्य सरकार ने भी कोई आपत्ति नहीं जताई।

डिवीजन बेंच ने दोनों पक्षों की सहमति के बाद आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता की प्रार्थना स्वीकार की जाती है और याचिका को भविष्य में इसी विषय पर किसी विधिक स्वतंत्रता के बिना वापस मानते हुए खारिज किया जाता है। साथ ही अदालत ने स्पष्ट किया कि याचिका वापस लिए जाने के कारण रजिस्ट्री द्वारा उठाई गई सभी तकनीकी आपत्तियां भी स्वतः समाप्त मानी जाएंगी।

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