हाईकोर्ट के फैसले से दैनिक वेतनभोगियों को राहत

High Court's decision brings relief to daily wage earners

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने कोरबा नगर निगम में पिछले दो दशकों से अधिक समय से कार्यरत 60 दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों के पक्ष में ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने राज्य सरकार द्वारा इन कर्मचारियों के नियमितीकरण के दावे को खारिज करने वाले 12 मई 2020 के आदेश को रद्द कर दिया है।

जस्टिस राकेश मोहन पांडेय की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि शासन केवल ‘ब्रेक इन सर्विस’ या ‘वित्तीय बाधाओं’ का हवाला देकर उन कर्मचारियों को उनके अधिकारों से वंचित नहीं कर सकता, जो वर्षों से निरंतर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। कोर्ट ने प्रतिवादी अधिकारियों को 180 दिनों के भीतर इन कर्मचारियों के नियमितीकरण पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया है।

24 साल की सेवा के बाद भी नियमितीकरण से किया था इनकार

याचिकाकर्ता मनीष मिश्रा सहित 60 अन्य दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों ने अधिवक्ता राजकमल सिंह और सूर्यप्रताप युद्धवीर सिंह के माध्यम से रिट याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि वे 1997-2000 के बीच कोरबा नगर निगम में नियुक्त हुए थे और तब से लगातार 23-24 वर्षों से काम कर रहे हैं।

राज्य शासन ने 2008 में एक सर्कुलर जारी किया था, जिसमें 10 साल की सेवा पूरी करने वाले दैनिक वेतनभोगियों के नियमितीकरण का प्रावधान था। हालांकि, सरकार ने इन 60 कर्मचारियों का दावा यह कहकर खारिज कर दिया था कि उनकी नियुक्ति 31 दिसंबर 1997 के बाद हुई है और उनके सेवा काल में एक कैलेंडर वर्ष में एक महीने से अधिक का ‘ब्रेक’ (अंतराल) रहा है।

सरकार ‘संवैधानिक नियोक्ता’ है, बाजार प्रतिभागी नहीं: हाईकोर्ट

अदालत ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न दृष्टांतों (धरम सिंह व प्रेम चंद केस) का हवाला देते हुए कहा कि सरकार एक बाजार प्रतिभागी नहीं, बल्कि एक ‘संवैधानिक नियोक्ता’ है।

कोर्ट के फैसले के प्रमुख बिंदु:

भेदभावपूर्ण रवैया: जब विभाग ने समान स्थिति वाले अन्य दैनिक वेतनभोगियों को नियमित कर दिया है, तो इन 60 याचिकाकर्ताओं के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता।
कृत्रिम ब्रेक: सेवा में थोड़े समय के अंतराल को नियमितीकरण रोकने का आधार नहीं बनाया जा सकता, खासकर तब जब कर्मचारी लंबे समय से पद पर बना हुआ हो।
जवाबदेही: कोर्ट ने कहा कि प्रशासन में अपारदर्शिता के कारण ही ‘तदर्थवाद’ (Ad-hocism) फलता-फूलता है। स्थायी प्रकृति के कार्यों के लिए सालों तक अस्थायी लेबल लगाकर काम लेना शोषण की श्रेणी में आता है।

180 दिनों के भीतर दावों की नए सिरे से समीक्षा करने का आदेश

हाईकोर्ट ने आदेश दिया है कि राज्य शासन और नगर निगम कोरबा इन 60 कर्मचारियों के नियमितीकरण के दावों की नए सिरे से समीक्षा करें। यह प्रक्रिया 180 दिनों के भीतर पूरी होनी चाहिए। इस फैसले से प्रदेश के हजारों अन्य दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों में भी उम्मीद की किरण जागी है, जो लंबे समय से नियमितीकरण की राह देख रहे हैं।

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