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आज के युग में भी दिख रहा है बैलगाड़ी में सवार दूल्हा

कांकेर @ धनंजय चंद। शादियों के दौरान आपने कई तस्वीरें देखी होंगी,जिसमें दूल्हा हेलीकॉप्टर से बारात लेकर पहुंचता है तो कोई लग्जरी गाड़ी से बारात लेकर पहुंचता है।लेकिन आज के आधुनिक जमाने मे एक ऐसी बारात निकाली जिसे जिसने देखा देखता रह गया। दूल्हा बैलगाड़ी पर सवार होकर अपनी दुल्हनिया लेने निकला तो हर कोई उसे निहारने लगा।चांदी के आभूषण के साथ धोती,कमीज और पारंपरिक वेशभूषा में सजे दूल्हा ने कहा कि उसने अपनी परंपरा निभाई है।देसी अंदाज में निकली इस बारात की लोगों ने जमकर सराहना की।दूल्हा बने शम्भू नाथ सलाम बड़गाँव सर्कल के क्षेत्रीय गोंडवाना समाज के अध्यक्ष है।और आधुनिकता की जमाने में अपनी शादी में परम्पराओ का पालन कर मिसाल पेश किया है।

गुरुवार को दोपहर लगभग एक बजे पिपली से करकापाल के लिए निकली बारात शाम चार बजे पहुंची।और रीति रिवाजों के साथ वैवाहिक कार्यक्रम शुरू हुआ।इस दौरान जिस रास्ते से यह बरात गुजरी वहां पर लोगो ने अपने दरवाजे,खिड़की,छतों पर खड़े होकर इस नजारा को बखूबी देखा,और फोटो और सेल्फी लेने की होड़ लग गई।मॉर्डन जमाने में देसी अंदाज की बारात को देखकर बुजुर्गों ने पुराने समय को याद किया।इस प्राचीन परंपरा को देख कर लोग बहुत खुश नजर आ रहे थे।महंगी मोटर गाड़ियों और हेलीकॉप्टर के इस युग में बैल गाड़ियों से बारात ले जाना एक परंपरा का पुनर्जीवन होता दिखाई दिया।

बेहद सादगीभरी इस परंपरा और जड़ों की ओर लौटने की यह पहल आदिवासियों को निश्चित ही अपनी परंपरा की ओर लौटने के लिये प्रेरित करेगी।बल्कि यह बारात आज की खर्चीली शादियों से बचने के लिए एक मिसाल के तौर पर जानी जाएगी।छत्तीसगढ़ी संस्कृति को संरक्षित रखने के इस प्रयास में शादी के दौरान सर्व समाज के पदाधिकारियों की भी मौजूदगी रही।सियाराम पुड़ो,गजेंद्र उसेंडी,नरेश कुमेटी, बलि वड्डे समेत तमाम समाजिक कार्यकर्ता मौजूद रहे।सिया राम पुड़ो ने कहा कि शम्भुनाथ का यह प्रयास आने वाली पीढ़ी को सामाजिक दिशा की ओर रुख करने का बेहतर तरीका है।उन्हें गर्व है कि आज के युवा पीढ़ी के लोग अपने संस्कृति और परम्पराओ को ना भूलते हुए उन्हें संरक्षित रखने के साथ आने वाली पीढ़ी को प्रेरित भी कर रहे है।

परम्पराओं को संरक्षित रखना ही रहा उद्देश्य – खास बात यह है कि इस शादी के पीछे की वजह केवल परम्पराओं को जीवित रखना है। दूल्हा शम्भू नाथ सलाम ने कहा कि बैलगाड़ी पर बारात की हमारी पुरानी परम्परा है। इसमें फिजूल खर्च नहीं होता है। परंपरा और संस्कृति को आगे बढ़ाना ही हमारा उद्देश्य है।इसलिए विवाह के हर रश्म को छत्तीसगढ़िया संस्कृति के नाम कर दिया।

दूल्हा शम्भू नाथ ने बताया कि आधुनिक के इस युग मे प्राचीन और छत्तीसगढ़ी हमारी परम्परा विलुप्त होती जा रही है।जिसे संजो कर और संरक्षित रखना हमारा कर्तव्य है।सामाजिक पदाधिकारी होने के नाते मैने अपना कर्तव्य निभाया है।ताकि आने वाले पीढ़ी के लोग भी आधुनिकीकरण से हटकर अपनी परम्पराओ और रीति रिवाजों के अनुसरण करें और अपनी परम्पराओ को न भूले।आज के आधुनिकीकरण में महंगे गाड़ीओ और महंगे बाजो के साथ बारात लेकर लोग जाते है।जिससे गरीब और मध्यम वर्ग के परिवारों पर विवाह के बाद कर्ज का काफी बोझ होता है।ऐसे में अपनी परंपराओ के अनुसार वैवाहिक कार्यक्रम करने से विलुप्त हो रही परम्पराओ का पुनर्जन्म होगा साथ ही हर वर्ग के लोग सादगीपूर्ण विवाह सम्पन्न करा पाएंगे।दुल्हन सरिता ने कहा कि शंभु नाथ ने बैलगाड़ी से बारात लाकर और विवाह में छत्तीसगढ़ी संस्कृति को बढ़ावा देकर एक बेहतर सामाजिक कार्यकर्ता का परिचय दिया है।जिससे काफी खुशी मिली।

आधुनिक के इस युग मे एकसाथ दर्जनों बैलगाड़ियों को देखना भी एक चर्चा का विषय बना रहा।क्योंकि आज के युग मे खेती किसानी का ज्यादातर काम मशीनीकरण हो चुका है।ऐसे में आज के जमाने मे एकसाथ दर्जनों बैलगाड़ीओ का व्यवस्था करना किसी चुनौती से कम नही होता।लेकिन बड़ेझाड़कट्टा के किसानों ने दर्जनों बैलगाडियां उपलब्ध कराकर शम्भूनाथ की शादी को यादगार बना दिया।बैलगाड़ी देने वाले किसानों ने बताया कि उन्हें भी बेहद खुशी हुई कि उनकी बैलगाड़ी खेती किसानी कार्य के साथ छत्तीसगढ़ी संस्कृति को पुनर्जन्म दिलाने के एक प्रयास में कामगार साबित हुई।

बेहद सादगीभरी इस परंपरा और जड़ों की ओर लौटने की यह पहल आदिवासियों को निश्चित ही अपनी परंपरा की ओर लौटने के लिये प्रेरित करेगी।बल्कि यह बारात आज की खर्चीली शादियों से बचने के लिए एक मिसाल के तौर पर जानी जाएगी।

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