स्पेशल स्टोरी – रीवा मप्र रिपोर्टर सुभाष मिश्रा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान से प्रेरित होकर सेना से रिटायर हुए पूर्व सैनिक योगेश तिवारी ने वो कर दिखाया है, जो सरकारी योजनाएँ भी पूरी तरह नहीं कर पाईं — गांव-गांव जाकर बेटियों को आत्मनिर्भर बनाना।

सेना से सेवानिवृत्त होने के बाद योगेश ने तय किया कि अब देश की सीमाओं की नहीं, समाज की सीमाओं को मजबूत करेंगे। उन्होंने “आत्मनिर्भर महिला सिलाई-बुनाई प्रशिक्षण कार्यक्रम” की शुरुआत की। इसके लिए उन्होंने खुद की पूंजी से मशीनें खरीदीं, सुई-धागा, कपड़े और अखबार लेकर गांवों में प्रशिक्षण शिविर लगाए।
पहले तो गांव की महिलाएं हिचकिचाईं, पर योगेश की समझाइश और लगन ने सबको प्रेरित कर दिया। जिन्होंने थोड़ा-बहुत सीखा था, उन्हें योगेश ने ट्रेनर बना दिया — और यहीं से शुरू हुई आत्मनिर्भरता की असली कहानी। आज 500 से ज़्यादा लड़कियां सिलाई, बुनाई, कढ़ाई में निपुण होकर खुद कमा रही हैं, परिवार का सहारा बन चुकी हैं।
किसी की आमदनी रोज़ ₹200 से ₹500 तक पहुँच गई है।
कई युवतियाँ अपने कपड़ों के डिज़ाइन खुद तैयार कर स्थानीय बाजारों में बेच रही हैं।
इन्हीं में से एक है 16 साल की लड़की, जिसके माता-पिता की सड़क हादसे में मृत्यु हो गई थी। दो छोटे भाई और एक बहन की जिम्मेदारी उसके कंधों पर आ गई थी। योगेश ने उसे मुफ्त में प्रशिक्षण दिलवाया और एक सिलाई मशीन गिफ्ट की।
आज वही बच्ची अपने भाई-बहन को स्कूल भेज रही है, घर का खर्च खुद उठा रही है — उसकी हिम्मत देख गांव वाले भी गर्व से कहते हैं, “अब हमारी बेटियां किसी से कम नहीं।”
गांवों में यह पहल इतनी लोकप्रिय हो गई है कि महिलाएं अब खुद योगेश को बुलाकर ट्रेनिंग कैम्प लगवाती हैं।
सैनिक की इस सामाजिक सेवा ने साबित कर दिया — देशभक्ति सिर्फ सीमा पर नहीं, समाज में भी निभाई जाती है।
