ग्राम दलदली व गोडालबाय स्कूल में घासफूस और पत्तो की झोपड़ी बना कर बच्चों को पढ़ाने को मजबूर

रिपोर्टर : लोकेश्वर सिन्हा
गरियाबंद। गरियाबंद जिले में शिक्षा विभाग और जिला प्रशासन की कार्य प्रणाली ने पालकों को अपनी समस्याओं और परेशानी का खुद ही समाधान करने को मजबूर कर दिया। जिला मुख्यालय से महज 30 और 35 किलोमीटर की दूरी पर स्थित ग्राम दलदली और गोडालबाय दोनों ही गांव में विशेष पिछड़ी जनजाति के कमार, भुंजिया और गोंड़ परिवारों के बच्चे पढ़ते है। दोनों ही गांव मे स्कूल के भवनों को नए निर्माण के नाम पर तोड़ दिया गया है। इस कारण बच्चो को पालको द्वारा मजबूरन दूसरे के खपरैल वाले घर मे या स्कूल में घासफूस और पत्तो की झोपड़ी बना कर पढ़ा रहे है।
दोनों ही गांव में बच्चो को पढ़ाने एक-एक एचएम और एक-एक शिक्षक है जो पहली से पाँचवी कक्षा के बच्चो को पढ़ा रहे है :
ग्राम दलदली में कुछ माह पहले प्राथमिक शाला के पुराने भवन को नए भवन निर्माण के नाम पर तोड़ दिया गया। जो आज तक अधूरा ही पड़ा हुआ है। सड़क भी पूरी तरह कीचड़ से सरोबार है। इस कारण प्राइमरी स्कूल के लगभग 30 बच्चे स्कूल नही जा पा रहे है, बच्चो की इस परेशानी को देखते हुए गांव के ही पंच ने अपने खपरैल वाले घर के बरामदे और आंगन को बच्चो को पढ़ाने के लिए दे दिया है। तो वही ग्राम गोडालबाय में स्कूल भवन तोड़ने के बाद से 50 बच्चें घांस फूंस की झोपड़ी नुमा छत के नीचे बैठकर पढ़ने को मजबूर है।
गर्मी हो ठंड हो या बरसात हो बच्चे पिछले 4 साल से इसी छत के नीचे पढ़ रहे है। हर साल इसे बनाने के लिए शिक्षक और पालक आपस मे चंदा करते है। बारिश में छत जगह जगह से टपकती ही है अगर इस दौरान ज्यादा बारिश हो जाती है तो बच्चे अपनी जगह पर खड़े हो कर पढ़ाई करते है।
गोड़लबाय स्कूल में तो भवन हैं मगर वंहा की हालात इतनी जर्जर हैं कि भवन के छत से पानी टपक रहा है जिसके कारण पूरे स्कूल के कमरे पानी से गीला होने के कारण बच्चे कमरे के अंदर भी नही बैठ पा रहे है।
वही बच्चों ने बताया कि घांसफूंस की छत पर और जमीन पर उनको कई बार सांप और बिच्छू जैसे कई जहरीले जीव जंतु दिखते है। इन सब खतरों के बावजूद बच्चे यहां पढ़ने आते है। कुछ दिनों पहले लगभग 10 से 12 बच्चो के पूरे शरीर पर फफोले पड़ गए थे।
ग्रामीणों ने बताया कि घाँसफूंस से बना झोपड़ी के छत पर किसी जहरीले जीव के शरीर से बहकर आ रहे पानी से भीगने के कारण बच्चो को इंफेक्शन हो गया था। 3 से 4 दिन तक इलाज कराने के बाद बच्चों की तबियत ठीक हुई है। मगर फिर से उनको इसी छत के नीचे बैठाकर पढ़ाने में अब उन्हें डर लगने लगा है।
ऐसा नही है कि इस बात की जानकारी ग्रामीणों ने शिक्षा विभाग या प्रशासन को नही दी।
ग्रामीणों ने कई बार शिक्षा विभाग के अधिकारियों को तो कई बार कलेक्टर जनदर्शन में इसकी शिकायत की है मगर समस्या का समाधान तो दूर पिछले चार साल में जिला प्रशासन के किसी भी जिम्मेदार अधिकारी ने यहां आने की जहमत तक नही उठाई है। इसके अलावा ग्राम पंचायत के सरपंच सचिव ने भी ग्रामीणों की किसी तरह से कोई मदद नही की। जिससे थक हार कर ग्रामीण अपने बच्चो की शिक्षा की नींव मजबूत करने खुद ही जद्दोजहद कर रहे है।
इस मामले में जिला शिक्षा अधिकारी बाइट देने से लगातार आनाकानी करते रहे और बाद में देने की बात कह रहे है।


