छत्तीसगढ़

शक्तिपीठ परियोजना से संवरेंगे छत्तीसगढ़ के पांच देवी धाम

Five Devi shrines in Chhattisgarh to be revitalized under the 'Shaktipeeth' project

रायपुर । पर्यटन एक ऐसी यात्रा या भ्रमण है, जो मनोरंजन या फुर्सत के क्षणों का आनंद उठाने के उद्देश्य से किया जाता है। अतिथि देवो भवः भारतीय परंपरा प्राचीन काल से रही है। छत्तीसगढ़ में लगभग 138 स्थलों को राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व के आधार पर पर्यटन स्थल के रूप में प्राथमिकता दी गई है, जिसमें 58 स्मारकों को 11 अभ्यारण 03 राष्ट्रीय उद्यान को संरक्षित घोषित किया गया है। पर्यटन मानव की प्राचीन एवं मौलिक प्रवृत्ति है। पर्यटन धरातलीय तथा मानवीय विभिन्नताओं विविधताओं का अवलोकन कर ज्ञान की बढ़ोतरी एवं मनोरंजन करता है। छत्तीसगढ़ प्राकृतिक और सांस्कृतिक पर्यटन का एक प्रमुख गंतव्य है। यहाँ के प्राकृतिक सौंदर्य और सांस्कृतिक धरोहर ने इसे एक प्रमुख पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया है।

छत्तीसगढ़ सरकार ने उत्तराखंड के चार धाम की तर्ज पर राज्य के प्रमुख धार्मिक स्थलों को जोड़ने के लिए शक्तिपीठ परियोजना की शुरुआत की है। इस परियोजना के तहत लगभग 1,000 किलोमीटर लंबे आध्यात्मिक और धार्मिक पर्यटन कॉरिडोर का विकास किया जा रहा है। छत्तीसगढ़ के प्रमुख शक्तिपीठों एवं महत्वपूर्ण पूजा स्थलों का विकास, सौंदर्याकरण तथा आधारभूत सुविधाओं का विस्तार किया जाएगा। शक्तिपीठों में श्रद्धालुओं के लिए सुगम पहुंच मार्ग, पेयजल, प्रकाश व्यवस्था, स्वच्छता, विश्राम स्थल एवं सुरक्षा व्यवस्था जैसी आवश्यक सुविधाएं विकसित की जाएंगी।

छत्तीसगढ़ आस्था पथ (शक्तिपीठ भ्रमण) योजना प्रारंभ करने जा रहे हैं, जिसमें पांचों शक्तिपीठों का भ्रमण एवं दर्शन कराया जाएगा, इसके लिए सरकार ने वर्ष 2026-27 के  बजट में 5 करोड़ का  प्रावधान किया है। प्रदेश के पांच शक्तिपीठों कुदरगढ़, डोगरगढ़, रतनपुर, चन्द्रपुर एवं दंतेवाड़ा को शक्तिपीठ सर्किट के रूप में विकसित करने के लिए बजटीय प्रावधान किया है। इस परियोजना के तहत रतनपुर स्थित मां महामाया, चंद्रपुर की मां चंद्रहासनी, डोंगरगढ़ की मां बम्लेश्वरी, दंतेवाड़ा की मां दंतेश्वरी और सूरजपुर के कुदरगढ़ मंदिर को एक धार्मिक सर्किट के रूप में विकसित किया जाना था। मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने सरकार गठन के बाद बजट में इसके लिए पांच करोड़ रुपये का प्रावधान भी किया गया था, जिससे प्रदेश में धार्मिक पर्यटन को नई दिशा मिलने की उम्मीद थी। इन पाँचों शक्तिपीठों को बेहतर सड़कों, यात्री सुविधाओं, विश्राम स्थलों और सुरक्षा इंफ्रास्ट्रक्चर से जोड़ना। छत्तीसगढ़ पर्यटन मंडल और जिला प्रशासन द्वारा इन मंदिरों में सौंदर्यीकरण और श्रद्धालुओं की सुविधाओं का काम तेजी से किया जा रहा है।

केंद्र सरकार की प्रसाद (PRASHAD)योजना के तहत छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले स्थित माँ महामाया मंदिर, रतनपुर के समग्र विकास के लिए 200 करोड़ की कार्ययोजना तैयार की गई है, जिसे केन्द्र सरकार के पर्यटन मंत्रालय को प्रेषित की गई है। उक्त कार्य योजना को स्वीकृति मिलते ही एंजेसी तय कर कार्य प्रारंभ की जाएगी। यह मंदिर 11वीं-12वीं शताब्दी के दौरान कलचुरी राजा रत्नदेव प्रथम द्वारा बनवाया गया था और यह माँ महालक्ष्मी एवं माँ महासरस्वती को समर्पित है। यह दक्षिण कोशल क्षेत्र की आराध्य देवी और रतनपुर राज्य की कुलदेवी के रूप में पूजी जाती हैं। इसके अलावा डोंगरगढ़, कुदरगढ़, चंद्रपुर और दंतेवाड़ा की शक्तिपीठों के लिए सीपीआर तैयार करने प्रक्रियाधीन है।

प्रसाद योजना के तहत केंद्र सरकार ने प्रथम चरण में देश के 26 धार्मिक तीर्थ स्थलों का चयन किया है। इन्हें पर्यटन के लिहाज से विकसित किया जा रहा है ताकि देश-विदेश के पर्यटक यहां पहुंच सकें। पर्यटन को बढ़ावा मिले। इन स्थलों की प्रसिद्धी का विस्तार हो। हमारे प्रमुख देवी तीर्थ स्थल महामाया मंदिर और दंतेश्वरी मंदिर को प्रसाद योजना में शामिल करवाने के लिए प्रस्ताव तैयार किया जाकर केंद्र सरकार को भेजा गया है।

यह सुविधाएं की जानी है विकसित

पांचों शक्तिपीठों में गार्डन, ठहने की व्यवस्था, लाइटिंग, हवन-पूजन स्थल, रेलिंग, पानी, सामुदायिक शौचालय, बैठने की व्यवस्था, रोप-वे, पर्यटन मंडल का केंद्र, सीसीटीवी कैमरा, सुरक्षा व्यवस्था और होम स्टे आदि की सुविधाएं विकसित की जानी है। इन स्थलों में बेहतर सड़क संपर्क, स्वच्छ पेयजल, आधुनिक शौचालय, सुव्यवस्थित पार्किंग, पर्यटक सहायता केंद्र, डिजिटल सूचना प्रणाली, प्राथमिक चिकित्सा और सुरक्षा जैसी आवश्यक सुविधाओं को प्राथमिकता के साथ विकसित किया जाएगा। इन पर्यटन स्थलों की विशिष्टता को ध्यान में रखते हुए उनके विकास में स्थानीय वास्तुकला, संस्कृति और प्राकृतिक परिवेश के संरक्षण का भी विशेष ध्यान रखा जाएगा।

1.    मां बम्लेश्वरी मंदिर डोंगरगढ़

छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले में स्थित डोंगरगढ़ की सुरम्य पहाड़ियों की गोद में विराजी माँ बम्लेश्वरी देवी इस क्षेत्र की ही नहीं, बल्कि देश-विदेश के लाखों-करोड़ों श्रद्धालुओं की अगाध आस्था का मुख्य केंद्र हैं। समुद्र तल से लगभग 1600 फीट की ऊँचाई पर पहाड़ी पर स्थित यह पवित्र मंदिर माँ शक्ति के पावन रूपों में विशेष स्थान रखता है। छत्तीसगढ़ के डोंगरगढ़ में स्थित माँ बम्लेश्वरी मंदिर का इतिहास लगभग 2200 वर्ष पुराना है। यह एक प्रसिद्ध शक्तिपीठ है। 2200 वर्ष पहले यहाँ कामाख्या नगरी (वर्तमान डोंगरगढ़) थी, जहाँ राजा वीरसेन का शासन था। निःसंतान होने पर उन्होंने शिव और दुर्गा की आराधना की। देवी की कृपा से उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, जिसके बाद उन्होंने इस मंदिर की स्थापना करवाई। 11वीं शताब्दी में कलचुरी राजा कर्णदेव ने इस मंदिर को पुनर्विकसित किया। बाद में 15वीं-16वीं शताब्दी में गोंड राजाओं ने इस क्षेत्र और मंदिर का विस्तार किया। मां बम्लेश्वरी मंदिर डोंगरगढ़ छत्तीसगढ़ ही नहीं देश-विदेशों में भक्तों के लिए आस्था का केंद्र हैं। मां बम्लेश्वरी मंदिर का इतिहास 2500 वर्ष से भी प्राचीन बताया जाता है। केंद्र सरकार ने यहां प्रसाद योजना के तहत अंतरराष्ट्रीय स्तर की परियोजना की घोषणा की है।

2.    मां महामाया मंदिर रतनपुर


रतनपुर महामाया मंदिर छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले के रतनपुर में स्थित एक प्रसिद्ध और ऐतिहासिक सिद्ध शक्तिपीठ है। बिलासपुर-कोरबा मार्ग पर महामाया देवी का यह मंदिर 1050 ईसवी में बना बताया जाता है। राजा रत्नदेव प्रथम द्वारा स्थापित मंदिर क्षेत्र को कलचुरियों की राजधानी माना जाता है। यह कलचुरी राजाओं की कुलदेवी का ऐतिहासिक मंदिर है, जहाँ माता का कंधा गिरने की मान्यता है।
इस मंदिर का निर्माण 11वीं-12वीं शताब्दी (लगभग 12-13वीं शताब्दी) में कलचुरी वंश के राजा रतनदेव प्रथम द्वारा कराया गया था। बाद में 1492 ईस्वी (विक्रम संवत 1552) में राजा बहार साईं ने वर्तमान मंदिर का जीर्णोद्धार व निर्माण कराया। गर्भगृह में माँ महामाया की दुर्लभ दोहरी (ड्यूअल) प्रतिमा है – आगे महिषासुरमर्दिनी और पीछे देवी सरस्वती की आकृति विराजमान है। ऐसी मान्यता है कि यहाँ माता सती का दाहिना हाथ गिरा था।

3.    मां दंतेश्वरी मंदिर दंतेवाड़ा


छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल में स्थित माँ दंतेश्वरी मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि स्थानीय जनजातीय परंपरा और सनातन आस्था के अद्भुत मिलन का सबसे बड़ा प्रतीक है। यह मंदिर दंतेवाड़ा में शंखिनी और डंकिनी नदियों के पवित्र संगम तट पर स्थित है, जो सदियों से आदिवासियों और आम लोगों की अगाध श्रद्धा का केंद्र रहा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यहाँ माता सती के दाँत गिरे थे, जिसके कारण इस पावन स्थल का नाम दंतेवाड़ा और माता का नाम दंतेश्वरी पड़ा। 14वीं शताब्दी में निर्मित इस मंदिर की अधिष्ठात्री देवी को बस्तर के काकतीय राजा अपनी कुलदेवी मानते थे। मंदिर के गर्भगृह में काले पत्थर से निर्मित छह भुजाओं वाली महिषासुरमर्दिनी की भव्य मूर्ति स्थापित है। विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा के दौरान इस मंदिर का महत्व सबसे चरम पर होता है। उत्सव के दौरान माता के छत्र और डोली को दंतेवाड़ा से जगदलपुर ले जाया जाता है, जिसमें शामिल होने के लिए दूर-दूर से हजारों आदिवासी और आम श्रद्धालु पैदल पहुँचते हैं। यह आयोजन क्षेत्र की सांस्कृतिक एकता और आपसी भाईचारे को दर्शाता है।

4.    मां बागेश्वरी कुदरगढ़ धाम

सूरजपुर जिले के ओडगी विकासखंड स्थित बागेश्वरी माता को राक्षसों के संहार के लिए जाना जाता है। यह शक्ति एवं साहस का प्रतीक माना जाता है।  1500 फीट ऊंचे पहाड़ों पर स्थित यह मंदिर चारों ओर घने जंगलों से घिरा है।  मान्यता के अनुसार कुदरगढ़ क्षेत्र मां भगवती पार्वती की तपोस्थली रही हैं। जहां माता भगवती ने शक्ति का रूप धारण कर राक्षसों का संहार किया था। बाद में इसी जगह पर लगभग चार सौ साल पहले राजा बालंद ने माता बागेश्वरी को स्थापित किया, वे माता के भक्त थे। बाद में चौहान वंश के राजा ने बालंद को युद्ध में पराजित कर दिया था, जिसके बाद उसी वंश ने माता के मंदिर की देख रेख की। तब से हर साल नवरात्र में सुबह की पहली आरती चौहान वंश के वंशज ही यहां करते हैं। 18वीं सदी में चौहान राजाओं ने छत्तीसगढ़ के मूल आदिवासी बैगा जनजाति को माता के देख-रेख और पूजा की जिम्मेदारी सौंपी थी, तब से आज तक बैगा समुदाय के लोग ही माता कि पूजा करते है।

5.    मां चंद्रहासिनी चंद्रपुर


छत्तीसगढ़ के सक्ती जिले (पूर्व में जांजगीर-चांपा) के चंद्रपुर में महानदी के तट पर स्थित मां चंद्रहासिनी देवी का मंदिर एक प्रसिद्ध सिद्ध शक्तिपीठ है। यह मंदिर महानदी और मांड नदी के संगम के पास चंद्रपुर में स्थित है। प्रचलित मान्यताओं के अनुसार, संबलपुर के राजा चंद्रहास ने इस मंदिर का निर्माण करवाया था, जिसके कारण इस स्थान का नाम ‘चंद्रपुर’ और देवी का नाम ‘चंद्रहासिनी’ पड़ा।  वर्ष 1522 में चांद्रपुर के गोंड राजा धुंध्या राम साह अत्राम ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था। गोंड राजाओं ने मां को अपनी कुलदेवी माना और शक्ति पूजा की परंपरा को आगे बढ़ाया।

सक्ती जिला स्थित मां चंद्रहासिनी मंदिर का इतिहास काफी प्राचीन है। यह चंद्रपुर की पहाड़ी पर स्थित हैं। मंदिर की सुंदर कलाकृति प्राचीनता का अनुभव कराती है। लोगों की माता को लेकर बड़ी आस्था है। इसे 52 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है, और ऐसी मान्यता है कि यहां माता सती का बायां कान गिरा था। वर्ष 1935 में महानदी में भीषण बाढ़ आई थी। तब राजा चंद्रहास के वंशज ठाकुर शशिभूषण ने माता को बकरा बलि अर्पित कर प्रार्थना की, जिसके बाद नदी का जलस्तर कम हो गया और लोगों की जान बची। आज भी नदी के पास पत्थर पर माता के पद-चिह्न मौजूद हैं, जिनकी पूजा की जाती है।

राज्य के आर्थिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक पारिस्थितिकी दृष्टि से संवहनीय पर्यटन को प्रोत्साहित करना है। छत्तीसगढ़ में पर्यटन, अनुभव की गुणवत्ता एवं आकर्षण को सुदृढ़ करना, छत्तीसगढ़ की समृद्ध एवं विविध सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण, संवर्धन एवं प्रचार-प्रसार करना, आर्थिक विकास एवं संबन्धित क्षेत्रों में पर्यटन के योगदान में वृद्धि करना। पर्यटन से संबन्धित अधोसंरचना के विकास में निजी निवेशकों के प्रयत्नों को प्रोत्साहित करना। शासन की भूमिका को सुविधापरक बनाना, पर्यटन के क्षेत्र में नई अवधारणाएं जैसे- टाइम शेयर, पारिस्थितिकी पर्यटन, साहसिक पर्यटन, इत्यादि को बढ़ावा देना। स्थानीय समुदाय की बौद्धिक सम्पदा एवं अधिकारों का सम्मान करना। छत्तीसगढ़ में पर्यटन को उद्योग का दर्जा देना, जिससे बेरोजगारों को रोजगार मिलने की संम्भावना होगी।

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