कोरबा: मानसून की सक्रियता के बाद स्कूलों में पानी भरने और छत से सिपेज होने की समस्या है वहीं पुरानी जर्जर भवनों के ढहने की आशंका बनी हुई है। जिला प्रशासन द्वारा जिला खनिज न्यास (डीएमएफ) मद से 113 जर्जर स्कूल भवनों को तोड़कर नए भवन निर्माण की स्वीकृति दी गई थी, लेकिन अब तक केवल 23 स्कूलों के लिए ही ध्वस्तीकरण (डिस्मेंटल) रिपोर्ट तैयार हो सकी है। शेष 90 स्कूलों में रिपोर्ट लंबित होने के कारण निर्माण कार्य शुरू नहीं हो पाया है। नवीन शैक्षणिक सत्र में विद्यार्थियों को पुराने और असुरक्षित भवनों में पढ़ाई करने की मजबूरी है।
जिला शिक्षा विभाग ने खतरनाक स्थिति में पहुंच चुके स्कूल भवनों की सूची तैयार कर प्रशासन को सौंपा था। ताकि उनके तकनीकी परीक्षण और ध्वस्तीकरण रिपोर्ट ग्रामीण यांत्रिकी सेवा (आरईएस) और लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) से प्राप्त किया जा सके। चार माह बीत जाने के बाद भी अधिकांश भवनों की रिपोर्ट तैयार नहीं हो सकी है। परिणामस्वरूप नए भवन निर्माण की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पा रही है। कई स्कूल भवन इतने जर्जर हो चुके हैं कि उनकी दीवारों और छतों में दरारें आ गई हैं। बरसात के मौसम में इनके गिरने का खतरा और बढ़ गया है, जिससे विद्यार्थियों और शिक्षकों की सुरक्षा को लेकर चिंता बनी हुई है।
कई स्थानों पर पुराने भवनों को हटाए बिना ही नए कक्षों का निर्माण कर दिया गया है, इसके कारण स्कूल परिसरों में उपलब्ध खुली जगह और खेल मैदान भी सिमट गए हैं। शहर के अंधरीकछार और रामपुर स्थित पीडब्ल्यूडी प्राथमिक शाला में पुराने भवनों को हटाकर नए निर्माण कार्य शुरू कर दिए गए हैं। इसके विपरीत शहर के निकट नकटी खार, भुलसीडीह सहित कई क्षेत्रों में नए भवनों की स्वीकृति मिलने के बावजूद डिस्मेंटल रिपोर्ट के अभाव में निर्माण कार्य प्रारंभ नहीं हो सका है। इन स्कूलों में कक्षाओं का संचालन तंग कमरों में किया जा रहा है। जिससे शिक्षण व्यवस्था प्रभावित हो रही है और विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने में कठिनाई आ रही है।
जर्जर भवनों के साथ-साथ जिला प्रशासन ने ऐसे स्कूलों की सूची भी मांगी है, जहां बाउंड्रीवाल (अहाता) नहीं है। अहाता नहीं होने के कारण स्कूल परिसरों में मवेशियों और आवारा कुत्तों का प्रवेश बना रहता है। इससे न केवल परिसर की स्वच्छता प्रभावित होती है, बल्कि विद्यार्थियों की सुरक्षा पर भी खतरा मंडराता रहता है। कई मामलों में बच्चों को आवारा कुत्तों द्वारा काटे जाने की शिकायतें भी सामने आई हैं। प्रशासन ने डीएमएफ मद से ऐसे स्कूलों में अहाता निर्माण कराने का निर्णय लिया है, लेकिन जर्जर भवनों के हटने में हो रही देरी के कारण यह कार्य भी प्रभावित हो रहा है।
प्रार्थना स्थल और साइकिल शेड निर्माण भी रुका
जिले के अनेक स्कूलों में प्रार्थना स्थल, साइकिल शेड और सांस्कृतिक मंच निर्माण की योजनाएं पहले ही स्वीकृत हो चुकी हैं। हालांकि स्कूल परिसरों में पर्याप्त स्थान उपलब्ध नहीं होने के कारण इन कार्यों की शुरुआत नहीं हो पा रही है। अधिकारियों का कहना है कि पुराने भवनों को हटाए जाने के बाद ही इन सुविधाओं का निर्माण संभव हो सकेगा। सांस्कृतिक मंच बनने से राष्ट्रीय पर्वों, वार्षिक उत्सवों और अन्य कार्यक्रमों के आयोजन में भी सुविधा मिलेगी।
पेयजल और बिजली व्यवस्था पर भी असर
पुराने और जर्जर भवनों की वजह से कई स्कूलों में मूलभूत सुविधाएं भी प्रभावित हो रही हैं। अनेक स्थानों पर बोरवेल और पानी की टंकियां खराब पड़ी हैं, जबकि अस्थायी जलापूर्ति से काम चलाया जा रहा है। बिजली व्यवस्था भी कई स्कूलों में अस्थायी कनेक्शन के भरोसे संचालित हो रही है। नए भवन बनने के बाद इन सुविधाओं में सुधार की उम्मीद जताई जा रही है।
हाथी प्रभावित गांवों में शिक्षकों के ठहरने की व्यवस्था अब भी अधूरी
जिले के हाथी प्रभावित वनांचल क्षेत्रों में शिक्षा व्यवस्था को सुचारू बनाने के लिए स्वीकृत 20 शिक्षक आवासों का निर्माण अब तक पूरा नहीं हो सका है। हाथियों के लगातार विचरण और शिक्षकों के विद्यालय तक पहुंचने में आने वाली कठिनाइयों को देखते हुए जिला प्रशासन ने इन आवासों की स्वीकृति दी थी। स्वीकृति के करीब आठ माह बाद भी एक भी आवास तैयार नहीं हो पाया है। निर्माण कार्य में देरी का असर नए शैक्षणिक सत्र में अध्यापन व्यवस्था पर पड़ने लगा है।
वर्षा को देखते हुए प्रत्येक विद्यालय प्रमुखों को कहा गया है कि जर्जर भवन में कक्षा का संचालन ना करें। शाला प्रबंध समिति से समन्वय बनाकर सुरक्षित स्थानों में कक्षा का संचालन करें। जर्जर स्कूलों की सूची जिला प्रशासन को सौंपी जा चुकी है। जिन स्कूलों को डिस्मेंटल की अनुमति मिल चुकी है, वहां निर्माण कार्य जारी है। तामेश्वर उपाध्याय, जिला शिक्षा अधिकारी
