महिला किसान की सफलता, देश-विदेश में लाल चंदन की मांग
Success of a woman farmer; demand for red sandalwood in India and abroad.

जगदलपुर। बस्तर की महिला किसान प्रभाती भारत ने लाल चंदन की खेती और जैविक कृषि के क्षेत्र में ऐसा मॉडल विकसित किया है, जो पूरे प्रदेश के किसानों के लिए प्रेरणा बन गया है। जगदलपुर से करीब 10 किलोमीटर दूर गारावंड खुर्द गांव की रहने वाली प्रभाती ने 16 वर्ष पहले महज 15 लाल चंदन के पौधों से शुरुआत की थी।
आज उनके खेत में करीब 200 लाल चंदन के वृक्ष तैयार हो चुके हैं और उनके प्रयास से बस्तर में लाल चंदन के संरक्षण एवं रोपण का दायरा लगातार बढ़ रहा है। प्रभाती ने वर्ष 2010 के आसपास भुवनेश्वर से लाल चंदन के पौधे मंगवाकर अपने खेत में लगाए। बाद में वन विभाग से भी कुछ पौधे मिले।
कई सार्वजनिक स्थलों पर भी लाल चंदन का रोपण कराया
वर्षों तक संरक्षण, नियमित देखभाल और जैविक पद्धति अपनाने का परिणाम यह रहा कि आज उनका खेत लाल चंदन की हरियाली से आच्छादित है। उन्होंने बालाजी मंदिर, मां दंतेश्वरी मंदिर, शिव मंदिर सहित कई सार्वजनिक स्थलों पर भी लाल चंदन का रोपण कराया है।
प्रभाती ने गांव की महिलाओं को संगठित कर जैविक खेती का अभियान शुरू किया। खेतों में मजदूरी करने वाली महिलाओं को प्रशिक्षण देकर प्राकृतिक खेती की ओर प्रेरित किया। आज गारावंड खुर्द बस्तर के उन चुनिंदा गांवों में शामिल है, जहां बड़ी संख्या में किसान बिना संकर बीजों के जैविक खेती कर रहे हैं।
450 से अधिक दुर्लभ किस्मों का संरक्षण
प्रभाती ने 450 से अधिक दुर्लभ और विलुप्तप्राय देशी धान की किस्मों का संरक्षण कर बीज बैंक तैयार किया है। वे बस्तर संभाग में बड़े पैमाने पर ब्लैक राइस (काला चावल) और रेड राइस (लाल चावल) की व्यावसायिक खेती करने वाली पहली महिला किसान हैं। उनके शुगर-फ्री लाल चावल और एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर ब्लैक राइस की मांग देश-विदेश तक है।
सफलता के पीछे परिवार का भी योगदान
प्रभाती भारत की इस सफलता के पीछे उनके परिवार का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उनके पति विजय भारत वनौषधीय पौधों के जानकार हैं, जबकि उनके ससुर स्वर्गीय विशाल भारत वन विभाग में रेंजर थे। प्रभाती ने औषधीय पादप बोर्ड से प्रशिक्षण लेकर ग्रामीण वनस्पति विशेषज्ञ का पाठ्यक्रम भी पूरा किया है और वर्तमान में विलुप्त होती वनस्पतियों के संरक्षण पर कार्य कर रही हैं।
आय बढ़ाने के लिए लाल चंदन बेहतर विकल्प
कृषि विशेषज्ञ भी मानते हैं कि बस्तर की जलवायु लाल चंदन की खेती के लिए उपयुक्त है। इंदिरा गांधी कृषि महाविद्यालय के विज्ञानी दीपक शर्मा के अनुसार प्रदेश के वन क्षेत्रों और खेतों की मेड़ों पर लाल चंदन का रोपण किसानों की आय बढ़ाने का बेहतर विकल्प बन सकता है। चंदन का वृक्ष तैयार होने में लगभग 15 से 20 वर्ष लगते हैं, लेकिन इसके बाद इसकी लकड़ी और तेल का बाजार मूल्य अत्यधिक होता है।



