वासेपुर मर्डर केस का आरोपी अंबिकापुर में ट्रेस
Accused in Wasseypur murder case traced to Ambikapur.

अंबिकापुर : वासेपुर के कुख्यात गैंगस्टर साबिर आलम को अंबिकापुर में शरण देने के आरोप पर पुलिस ने राजहंस बस के संचालक बैदुल खान समेत अन्य के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की है। दोहरे हत्याकांड के अभियुक्त साबिर आलम को धनबाद पुलिस भगोड़ा घोषित कर चुकी है। साबिर आलम पिछले कई वर्षों से पहचान छिपाकर शहर में रह रहा था और उसने यहां बस, एंबुलेंस व जमीन का बड़ा कारोबार खड़ा कर लिया था।
झारखंड की धनबाद पुलिस पिछले दिनों गुप्त सूचना पर साबिर आलम को गिरफ्तार करने आई थी। यहां उन्हें विरोध का सामना करना पड़ा था। मौका देखकर साबिर आलम यहां से भाग निकलने में सफल हो गया था। कुख्यात अपराधी के शहर में छिपे होने की जानकारी सामने आने के बाद भाजपा ने भी प्रकरण की बारीकी से छानबीन की मांग को लेकर वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को ज्ञापन सौंपा था। पुलिस की प्रारंभिक जांच में सामने आया कि सजायाफ्ता साबिर आलम शुरुआती दौर में अंबिकापुर के मोमिनपुरा में पहचान छिपाकर रह रहा था। उसे यहां पनाह देने में राजहंस बस के संचालक बैदुल खान निवासी मोमिनपुरा की मुख्य भूमिका रही।
बैदुल खान यह जानते हुए भी कि साबिर आलम भगोड़ा घोषित है और उसे आजीवन कारावास की सजा मिली है उसके बाद भी उसे आश्रय दिया। धीरे-धीरे साबिर ने अंबिकापुर में अपना कारोबार जमा लिया। उसकी दो बसें बिहार के सासाराम और पटना तक चलती हैं। तीन दर्जन से अधिक एंबुलेंस का संचालन करता था, जो औद्योगिक इकाइयों में भी अनुबंध पर चलती थीं। इसके अलावा उसने अंबिकापुर शहर और आसपास जमीन में बड़ी रकम निवेश की और धीरे-धीरे जमीन की बिक्री भी शुरू कर दी।
वार्ड नंबर 42 हबीब नगर में उसने मकान बना लिया था, जहां परिवार के सदस्यों के साथ रहने की जानकारी मिली है। जांच में पुष्टि हुई कि साबिर आलम को अंबिकापुर में बसाने में बैदुल खान भूमिका है। कोतवाली पुलिस ने बैदुल खान व अन्य अज्ञात सहयोगियों के विरुद्ध बीएनएस की धारा 249 के तहत अपराध पंजीबद्ध कर विवेचना में लिया है। यह भी पता चला है कि सिर्फ साबिर ही नहीं उसके साथ जावेद आलम भी रहता था,वह भी झारखंड के कई संगीन अपराधों में शामिल रहा है।
क्या है पूरा मामला
18 अक्तूबर 2001 को वासेपुर के डॉन कहे जाने वाले फहीम खान की मां नजमा खातून और मौसी शहनाज खातून की दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस दोहरे हत्याकांड में चार जून 2007 को धनबाद के तत्कालीन जिला एवं सत्र न्यायाधीश रामाशंकर शुक्ला ने साबिर आलम को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। साबिर ने झारखंड हाईकोर्ट में अपील की, लेकिन 22 अक्तूबर 2014 को हाईकोर्ट ने अपील खारिज कर सजा बहाल रखी।उसके पहले ही जमानत पर बाहर आ चुके साबिर ने जिला अदालत में समर्पण नहीं किया और 2013 से फरार चल रहा था। उसे भगोड़ा घोषित कर संपत्ति कुर्की का आदेश भी जारी किया गया था। धनबाद पुलिस पर उसकी गिरफ्तारी का दबाब है।
गैंग्स आफ वासेपुर का अहम किरदार है साबिर
वासेपुर के खूनी संघर्ष पर ‘गैंग्स आफ वासेपुर’ फिल्म भी बन चुकी है। एक दौर में कोयला, रेलवे ठेकेदारी, जमीन और लोहे का कारोबार फहीम खान की मर्जी के बिना नहीं होता था। उसी दौर में उसकी मां-मौसी की हत्या साबिर आलम और उसके सहयोगियों ने की थी। उम्रकैद की सजा मिलने के बाद फरार साबिर आलम बड़े आराम से अंबिकापुर में अपना दिन गुजार रहा था। धनबाद पुलिस के नहीं आने शायद इसका पता भी नहीं चल पाता। स्थानीय स्तर पर वह कई लोगों के साथ घुलमिल गया था। उसके अगल-बगल में रहने वाले लोग अब मौन हैं ,उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा कि इतना कुख्यात अपराधी जिसकी पुलिस को तलाश थी वह इतने आराम से यहां कैसे निवास कर रहा था।



