जांजगीर के 12 रेत घाटों पर हाईकोर्ट का बड़ा आदेश
High Court's major order regarding 12 sand ghats in Janjgir

जांजगीर चांपा। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने जांजगीर-चांपा जिले के विभिन्न रेत घाटों के लिए जारी निविदा आमंत्रण सूचना (NIT) और ई-रिवर्स ऑक्शन (इलेक्ट्रॉनिक उल्टी नीलामी) प्रक्रिया को चुनौती देने वाली 12 जनहित/रिट याचिकाओं के समूह को एक साथ खारिज कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश की डिवीजन बेंच ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि निविदा प्रक्रिया में स्वेच्छा से भाग लेने वाले और उसमें असफल होने वाले निविदाकारों को बाद में पूरी प्रक्रिया की वैधता पर सवाल उठाने का कोई विधिक या नैतिक अधिकार नहीं है।
माननीय मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और माननीय न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने इन सभी 12 याचिकाओं (WPC No. 3180, 3182, 3185, 3186, 3200, 3210, 3216, 3217, 3225, 3226, 3237 और 3243 of 2026) पर एक साथ सुनवाई करते हुए यह साझा ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।
क्या है पूरा मामला?
छत्तीसगढ़ सरकार ने खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 के तहत ‘छत्तीसगढ़ गौण खनिज साधारण रेत (उत्खनन एवं व्यापार) नियम, 2025’ बनाया था। इसके अंतर्गत जांजगीर-चांपा के तत्कालीन कलेक्टर (खनिज शाखा) ने अक्टूबर और नवंबर 2025 तथा मार्च 2026 में विभिन्न तारीखों पर जिले के अलग-अलग रेत घाटों (जैसे पुछेली, भादा, बोरसी, केराकछार, नवापारा, देवरघटा, पीथमपुर, तनौद, गड़ापाली, कानसदा, पेंडरिमहाल और करनौद) के लिए ई-रिवर्स ऑक्शन के जरिए निविदाएं आमंत्रित की थीं।
इन निविदाओं के खिलाफ जांजगीर-चांपा निवासी आनंद तिवारी, उनकी पत्नी पूजा तिवारी, प्रकाश पांडे, दुर्गेश सिंह और रूचि सिंह ने हाई कोर्ट में याचिकाएं दायर की थीं।
याचिकाकर्ताओं की दलील: ‘बिना जिला सर्वेक्षण रिपोर्ट (DSR) के नीलामी अवैध’
याचिकाकर्ताओं की ओर से पैरवी करते हुए अधिवक्ता आशुतोष पांडेय ने दलील दी कि रेत खनन के लिए निविदा जारी करने या पट्टा देने से पहले एक वैध और स्वीकृत जिला सर्वेक्षण रिपोर्ट (District Survey Report – DSR) का होना अनिवार्य वैधानिक शर्त है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के स्टेट ऑफ यूपी बनाम गौरव कुमार (2025), दीपक कुमार (2012) और स्टेट ऑफ बिहार बनाम पवन कुमार (2022) के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि बिना अंतिम रूप से स्वीकृत DSR के केवल ड्राफ्ट (प्रारूप) के आधार पर नीलामी प्रक्रिया शुरू करना पूरी तरह से गैरकानूनी और पर्यावरण नियमों के खिलाफ है।
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि हाई कोर्ट ने इसी आधार पर 15 मई 2026 को हाथनेवरा गांव की निविदा (WPC No. 1970/2026) को रद्द कर दिया था, इसलिए इन निविदाओं को भी रद्द किया जाए।
शासन का विरोध: ‘नीलामी में हिस्सा लिया, हार गए तो कोर्ट आ गए’
दूसरी तरफ, राज्य शासन की ओर से महाधिवक्ता (Advocate General) विवेक शर्मा और अतिरिक्त महाधिवक्ता प्रवीण दास ने याचिकाओं का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कोर्ट को बताया कि याचिकाकर्ताओं ने अदालत से महत्वपूर्ण तथ्य छुपाए हैं। इन सभी याचिकाकर्ताओं ने बिना किसी आपत्ति के इन सभी नीलामियों में खुद भाग लिया था। जब वे न्यूनतम बोलीदाता (L-1) नहीं बन पाए और ठेका हासिल करने में असफल रहे, तब वे केवल 15 मई
2026 के पुराने फैसले का फायदा उठाने के लिए अब कोर्ट पहुंचे हैं।
निजी पट्टाधारकों (सफल बोलीदाताओं) की ओर से अधिवक्ता हेमंत केशरवानी और विक्रम शर्मा ने भी दलील दी कि रिवर्स ऑक्शन की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी थी और सफल ऑपरेटरों के पक्ष में अधिकार सृजित हो चुके हैं, इसलिए इस स्तर पर दखल देना जनहित और राजस्व के खिलाफ होगा।
हाई कोर्ट का कानूनी विश्लेषण और अंतिम फैसला
डिवीजन बेंच ने दोनों पक्षों को विस्तार से सुनने के बाद याचिकाकर्ताओं की तुलना पुराने मामले (हाथनेवरा केस) से करने की मांग को खारिज कर दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में निम्नलिखित महत्वपूर्ण बिंदु रेखांकित किए:
पुराने फैसले और इस मामले में अंतर: हाथनेवरा वाले मामले में याचिकाकर्ता निविदा जारी होते ही तुरंत कोर्ट आ गया था, जिससे प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ी थी। जबकि इस मामले में निविदाएं अक्टूबर-नवंबर 2025 में जारी हुई थीं और याचिकाकर्ता पूरी प्रक्रिया खत्म होने तथा सफल ऑपरेटरों के चयन के बाद साल 2026 में काफी देरी से कोर्ट आए हैं।
विबंध और मौन सहमति का सिद्धांत (Estoppel & Acquiescence): कोर्ट ने साफ कहा कि याचिकाकर्ताओं ने खुद बिना किसी विरोध के निविदा शर्तों को स्वीकार करते हुए स्वेच्छा से ऑक्शन में भाग लिया था। कानूनन, खेल में शामिल होने और उसमें हार जाने के बाद कोई भी खिलाड़ी खेल के नियमों को चुनौती नहीं दे सकता।
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने अपने आदेश में स्पष्ट किया:
चूंकि याचिकाकर्ताओं ने स्वयं इन निविदा प्रक्रियाओं में भाग लिया था, इसलिए सफल ऑपरेटरों की घोषणा हो जाने के बाद वे केवल परिणाम अनुकूल न होने के कारण पूरी प्रक्रिया को चुनौती नहीं दे सकते। इस उन्नत चरण पर हस्तक्षेप करने से संपन्न हो चुके संविदात्मक अधिकार अस्त-व्यस्त हो जाएंगे और सार्वजनिक हित को गंभीर नुकसान पहुंचेगा। देरी और तथ्यों को स्वीकार कर लेने के आचरण के कारण याचिकाकर्ता धारा 226 के तहत किसी भी विवेकाधीन राहत के हकदार नहीं हैं।”
इस कड़े रुख के साथ हाई कोर्ट ने रेत घाटों के आवंटन को चुनौती देने वाली सभी 12 याचिकाओं को बिना किसी जुर्माने या खर्च (No order as to costs) के खारिज कर दिया। इसके साथ ही रजिस्ट्री द्वारा उठाई गई तकनीकी आपत्तियों को भी समाप्त माना गया।


