छत्तीसगढ़

अनुकंपा नियुक्ति पर हाईकोर्ट का बड़ा निर्देश

High Court's major directive on compassionate appointment

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े एक मामले में पुलिस महानिदेशक को निर्देश जारी करते हुए कहा है कि लंबित आवेदन पर 90 दिनों के भीतर नियमानुसार निर्णय लिया जाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि वह मामले के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं कर रही है, लेकिन वर्षों से लंबित आवेदन पर सक्षम प्राधिकारी को फैसला लेना चाहिए।

न्यायमूर्ति राकेश मोहन पांडेय की एकलपीठ ने बलौदाबाजार-भाटापारा जिले की निवासी सावित्री ठाकुर की याचिका का निराकरण करते हुए यह आदेश दिया। याचिकाकर्ता ने पति की मृत्यु के बाद अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन दिया था, लेकिन उस पर अब तक कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया था।

सेवा के दौरान आरक्षक पति का हुआ था निधन, वर्षों से अटका था मामला

याचिका में बताया गया कि सावित्री ठाकुर के पति लोकप्रताप सिंह पुलिस विभाग में आरक्षक के पद पर पदस्थ थे। 17 सितंबर 2018 को सेवा के दौरान उनका निधन हो गया। इसके बाद याचिकाकर्ता ने 13 जनवरी 2021 को अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन प्रस्तुत किया, लेकिन विभागीय स्तर पर वर्षों तक मामला लंबित रहा। आवेदन पर निर्णय नहीं होने से परेशान होकर उन्होंने हाईकोर्ट की शरण ली।

शासन ने आपराधिक केस का दिया हवाला, कोर्ट ने मेरिट पर बिना टिप्पणी दिए दिए निर्देश

सुनवाई के दौरान राज्य शासन की ओर से याचिका का विरोध किया गया। शासन ने दलील दी कि आरक्षक की आत्महत्या के बाद याचिकाकर्ता के खिलाफ आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण का अपराध दर्ज किया गया था। हालांकि ट्रायल कोर्ट ने उन्हें संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया, लेकिन पुलिस विभाग जैसे अनुशासित बल में ऐसे मामले को ध्यान में रखा जाना आवश्यक है।

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता का आवेदन अब भी लंबित है। ऐसे में न्यायालय ने मामले के मेरिट में प्रवेश किए बिना डीजीपी, छत्तीसगढ़ को निर्देशित किया कि वे अनुकंपा नियुक्ति संबंधी आवेदन पर आदेश की प्रति प्राप्त होने की तिथि से 90 दिनों के भीतर विचार कर विधिसम्मत निर्णय पारित करें।

मामले की प्रमुख बातें (फैक्ट्स)

आरक्षक लोकप्रताप सिंह का 17 सितंबर 2018 को निधन हुआ।
पत्नी सावित्री ठाकुर ने 13 जनवरी 2021 को अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन दिया।
आवेदन पर विभाग ने वर्षों तक अंतिम निर्णय नहीं लिया।
शासन ने आपराधिक प्रकरण का हवाला देकर याचिका का विरोध किया।
ट्रायल कोर्ट ने महिला को संदेह का लाभ देकर बरी किया था।
हाईकोर्ट ने डीजीपी को 90 दिनों में निर्णय लेने का निर्देश दिया।

 

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