लोकेश्वर सिन्हा, गरियाबंद
गरियाबंद —- राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र कहे जाने वाले कमर जनजाति के बच्चों के लिए स्कूल भवन नसीब नहीं हो रहा है कभी यह स्कूल भवन को ग्रामीणों के द्वारा चंदा इकट्ठा कर संचालित किया जाता था लेकिन अब चंदे की यह पाठशाला पर ताला लटका हुआ है विशेष पिछड़ी जन जाति के कमार बच्चे अब शिक्षा से वंचित हो रहे हैं अब पढ़ाई छोड़कर मवेशी चराने एवं घरेलू काम करने को मजबूर हैं पूरा मामला क्या है देखिए इस रिपोर्ट में……
—- जरा गौर से देखिए इन बच्चों के चेहरे पर भविष्य दिख रहा है लेकिन अब यह घर के काम करने को मजबूर हो गए हैं मामला गरियाबंद जिले के मैनपुर विकासखंड के गुमरा पदर ग्राम पंचायत के आश्रित ग्राम माकर खलिया मे कमार जनजाति के बसाहट का है जहां आज से 3 साल पहले ग्रामीणों के द्वारा चंदा इकट्ठा कर स्कूल का संचालन किया जा रहा था एवं बाकायदा एक शिक्षक की व्यवस्था की गई थी साथ ही राशन सामग्री एकत्रित कर मध्यान भोजन भी संचालित होता था लेकिन अब यह चंदे की पाठशाला में ताला लटका हुआ है जिस वजह से आदिवासी बच्चे अब पढ़ाई से वंचित होने को मजबूर हैं गांव के तकरीबन 25 बच्चे पढ़ाई तो करना चाहते हैं लेकिन स्कूल नहीं होने से अब पढ़ाई छोड़कर घर में मवेशी चराने एवं अन्य काम करने को मजबूर हो गए हैं ।
—- आपको बता दे की पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के कार्यकाल के दौरान ग्रामीणों ने कांग्रेस के आला नेताओं के साथ मिलकर गांव में स्कूल संचालित करने के साथ ही पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न स्वर्गीय राजीव गांधी जी की मूर्ति स्थापित करने की मांग को लेकर कांग्रेस पार्टी के शीर्ष नेत्री सोनिया गांधी से भी मुलाकात किया था इसके बाद गांव के चौक में राजीव गांधी जी की प्रतिमा का अनावरण भी हुआ लेकिन सरकार के द्वारा स्कूल खोलने को लेकर कोई पहल नहीं हुई तो वही ग्रामीण चंदा इकट्ठा कर स्कूल संचालन शुरू कर दिया आखिर चंदे की पाठशाला कब तक चलती मंदी के कारण यह चंदे की पाठशाला बंद हो गई और स्कूल में अब ताला लटक गया है
राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र कहे जाने वाले विशेष पिछड़ी जनजाति के कमार बच्चे अब पढ़ाई से वंचित हो रहे हैं तो वहीं गांव तक बिजली पानी की व्यवस्था तो पहुंच गई लेकिन बच्चों को स्कूल भवन नसीब नहीं हुआ साथ ही कुपोषण दूर करने के लिए सरकार के द्वारा चलाए जा रहे आंगनबाड़ी केंद्र भी नहीं है यह पूरा गांव वन विभाग के रिजर्व क्षेत्र मे होने का हवाला देकर प्रशासन भी पल्ला झाड़ लेती है बैरल अब देखना होगा कि आदिवासी बच्चों को कब तक स्कूल भवन नसीब होता है या फिर यह मासूम बच्चे अपना भविष्य घर पर ही बर्बाद करने को मजबूर होंगे ।



