छत्तीसगढ़
बस्तर की आराध्य देवी माँ दंतेश्वरी की कहानी चलाये
Play the story of Maa Danteshwari, the revered goddess of Bastar.

जिला संवाददाता दंतेवाड़ा
किशोर कुमार रामटेके
लोकेशन दंतेवाड़ा
बस्तर की हरी-भरी वादियों में, जहाँ शंखनी और डंकनी नदी ए तट पर वहाँ विराजमान है माँ दंतेश्वरी का प्राचीन मंदिर। यह मंदिर न केवल एक धार्मिक स्थल है, बल्कि सदियों पुरानी पौराणिक कथाओं और चमत्कारों का जीवंत गवाह भी। शंखनी और डंकनी नदियों के पवित्र संगम पर बसा यह मंदिर, जहाँ पानी की धाराएँ लगातार बहती रहती हैं, मानो देवी की अनंत ऊर्जा का प्रतीक हो। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यहाँ सती माता का दाँत गिरा था, जब भगवान शिव उनके शव को लेकर तांडव कर रहे थे। इसी दाँत से देवी का नाम दंतेश्वरी पड़ा, और यह स्थल 52 शक्ति पीठों में से एक बन गया
स्थानीय आदिवासी जनजातियाँ देवी को अपनी कुलदेवी मानती हैं, और बस्तर दशहरा जैसे त्योहारों में यह मंदिर केंद्र बिंदु बन जाता है।
कहते हैं कि माँ दंतेश्वरी की प्रतिमा पूरे भारत में अनोखी छह भुजाओं वाली महिषासुरमर्दिनी की काले पत्थर से बनी मूर्ति, जो दुर्गा माँ का उग्र रूप दर्शाती है।
यह प्रतिमा चिंदक नागवंशी राजाओं द्वारा 13वीं शताब्दी में स्थापित की गई थी, और इसका निर्माण इतना रहस्यमय है कि आज भी इसमें जीवंतता महसूस होती है। लेकिन इस मंदिर की असली जादूगरी तो वे चमत्कार हैं, जो पुजारी जिया बाबा जैसे समर्पित सेवकों को अनुभव होते हैं। जिया बाबा, जो मंदिर के प्रधान पुजारी हैं, वर्षों से देवी की सेवा में लगे हैं। वे बताते हैं कि जो लोग माँ के करीब रहते हैं, उन्हें प्रतिमा में सूक्ष्म परिवर्तन दिखाई देते हैं – कभी माँ की आँखों में एक नई चमक, कभी चेहरे पर हल्की मुस्कान, मानो देवी जीवित होकर अपने भक्तों से बात कर रही हों। और सबसे रोमांचक, कभी-कभी रात के सन्नाटे में माँ के पायल की झनकार सुनाई देती है, जैसे देवी स्वयं मंदिर में विचरण कर रही हों। ये अनुभव न केवल आस्था को मजबूत करते हैं, बल्कि यह दर्शाते हैं कि देवी की शक्ति कितनी जीवंत और सजीव है।
इस वर्ष 2025 की शारदीय नवरात्रि में यह मंदिर और भी जीवंत हो उठा। 22 सितंबर से शुरू हुए इस पवित्र उत्सव में रोजाना लाखों श्रद्धालु दंतेवाड़ा पहुँचे, देवी के दर्शन के लिए लंबी कतारें लगीं है। पहले दिन ही 9,500 ज्योति कलश जलाए गए, और वातावरण में घंटियों की ध्वनि, आरती के स्वर और भक्तों की जयकाराएँ गूँज रही थीं। दूर-दूर से आए लोग, आदिवासी समुदाय से लेकर शहरी यात्री, सभी एक ही उद्देश्य से: माँ की कृपा प्राप्त करना। नवरात्रि के दौरान मंदिर का परिसर एक मेले जैसा बन जाता है, जहाँ लोक नृत्य, पारंपरिक संगीत और प्रसाद की सुगंध हर तरफ फैली रहती है। लेकिन इस भीड़ में भी, जिया बाबा जैसे पुजारी शांतचित्त रहते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि देवी सबकी रक्षा कर रही हैं।
माँ दंतेश्वरी की कहानी सिर्फ पौराणिक कथाओं तक सीमित नहीं – यह जीवंत आस्था, चमत्कारों और समुदाय की एकता की कहानी है। शंखनी और डंकनी नदियों की तरह, जो मिलकर बहती हैं, यह मंदिर भी लोगों को एकजुट करता है। जिया बाबा की बातें हमें याद दिलाती हैं कि सच्ची भक्ति में देवी स्वयं प्रकट होती हैं, और उनकी पायल की झनकार हमेशा हमें उनकी निकटता का एहसास कराती रहेगी। जय माँ दंतेश्वरी!



